Friday, 4 August 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

बसति बसति बसबासता मिलिअब पर समुदाय | 
बसे बसेरा आपुना केहि हेतु कर दाए || १ || 
भावार्थ : - यदि एक पराए देश का सम्प्रदाय जब विद्यमान भारत के वस्ति वस्ति में निवासित है तब उसका विभाजन कर एक बसा बसाया राष्ट्र उसे किस हेतु दिया गया |

एक नहीं दो नहीं तीन तीन राष्ट्र इन्हें दिए गए तथापि ये भारत की छाँती में मूंग दल रहे हैं इनके लिए इस देश का और कितना विभाजन होगा.....?


आन बसे परबासिया भए बिनु देस सदेस |
बिरावन भयउ भारती होत जात निज देस || २ || 
भावार्थ : -- अब देश में बसे पराए,  देश रहित होते हुवे भी देशवाल हो गए |  जो देशवाल थे, राष्ट्रिक थे वह राष्ट्र विहीन होकर राष्ट्र के स्वत्वाधिकार से वंचित हो गए, उनके लिए १९४७ की स्वतंत्रता अभिशाप सिद्ध हुई |

स्पष्टीकरण : - १९४७ के भारत विभाजन में भारत के मूल निवासी जो विभाजित देश में निवास करते थे उन्हें भारत लाया नहीं गया अब वह अभारतीय कहलाते हैं |

खंड खंड होतब अजहुँ भयऊ भारत सेष | 
अस तो हो रहि जाएगा सनै सनै अवसेष || ३ || 
भावार्थ : -- विद्यमान समय में स्थिति यह है कि यह अखंड भारत खंड-खंड होकर शेष भारत में परिवर्तित हो गया है  यदि यही अनुक्रम चलता रहा तो यह अवशेष मात्र होकर रह जाएगा  |

जनमानस भरमाइ के करतब खंडहि खंड | 
अगजग सबहि कहत फिरें यह तो देस अखंड || ४ ||  
भावार्थ : - जनमानस को भ्रमित करके इस देश को खंड-खंड किया | और संसार भर में ये सत्ता के लालची कहते मिले कि यह देश अखंड है | यह देश खंड- खंड हो चुका है जनमानस इस भ्रम में न रहे कि यह अखंड भारत है अब यह जितना है उतना को तो बचा लें.....

स्पष्टीकरण : -- १९७६ के ४२वें संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में  'अखंडता' शब्द भी जोड़ा गया..... 

स्वाधीनता सबद तब होतब अर्थ बिहीन | 
रजे राज सो देस में जिनकर रहे अधीन || ५ || 
भावार्थ : -- स्वाधीनता शब्द तब अर्थ विहीन हो जाता है जब देश में वही राज करता हो जिसके की वह अधीन था |

स्वत्वाधिकार तैं जो स्वाजन्य परिरोधि | 
सो बिधि सो सबिधायनी होत स्वतोबिरोधि || ६ || 
भावार्थ : - किसी विधि द्वारा विहित अधिनियम अथवा उसके उपबंध जब मूल निवासियों के स्वत्वाधिकार को परिरुद्ध करते हैं तब वह संविधान अपने ही राष्ट्र का विरोधी होता है |

दास करत गोसाइयाँ गोसाईँ कर दास | 
सासन करे बिलास जब जन जन होत उदास || ७ || 
भावार्थ : -   जब जनमानस अपने अस्तित्व के बौद्धिक तत्वों से अनभिज्ञ होते हुवे सुषुप्त और शासन निर्द्वन्द्व सुख उपभोग में मग्न होता है, तब स्वामी स्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर दासत्व को तथा दास  उन अधिकारों से संपन्न होकर स्वामी के पद को प्राप्त होते जाते हैं |


अचेतन होत जहँ जन मानस रहे उदास | 
तहँ कर सब सुख सम्पदा बसे परायो बास || ८ || 
भावार्थ : --  जहाँ जनमानस अपने अस्तित्व के बौद्धिक तत्वों से अनभिज्ञ होते हुवे सुषुप्त अवस्था में होता है वहां की सभी सुख सम्पदाएँ पराए देशों में जा बसती हैं और वहां निर्धनता का वास हो जाता है |

उदर परायन होइ के सोते रहे न कोए | 
जगत परायन संग अब देस परायन होएं || ९ || 
भावार्थ : - जगत के अस्तित्व में किसी राष्ट्र  का अस्तित्व निहित होता है, राष्ट्र के अस्तित्व में उसके जनमानस का अस्तित्व निहित होता है | जनमानस छुद्र स्वार्थों के वशीभूत होकर उदर की पूर्ति करने में न लगा रहे कि वह सुषुप्त अवस्था का त्याग कर स्व-कर्त्तव्य के विषय में सचेत होते हुवे जागृत रहे और जगत का चिंतन करते हुवे देश का चिंतन करे |

परबसिया जहँ दरसिया बसबासत सब कूल | 
कहँ भारत कहँ भारती कहँ भारत के मूल || १० || 
भावार्थ : - एक जागृत जनमानस को संविधान से यह प्रश्न अवश्य करना चाहिए कि सीमावर्ती प्रदेशों में जहाँ तक देखो वहां पराई शाखाएं ही निवास करती दिखाई देती हैं ऐसी परिस्थिति में भारत कहाँ है, भारतीय कहाँ हैं, और भारत की वह जड़ें कहाँ हैं जिनसे यह राष्ट्र परिपोषित हुवा है |

सासन भोगे बिषय रस डीठ धरे चहुँ कोत | 
रूखे जन को चाहिये जोगे जगरित होत || ११ || 
भावार्थ : - शासन विषय जनित रसों का आनंद लेने में निमग्न है | सुषुप्त जनमानस को चाहिए कि वह जागृत होकर अपने स्वत्व के विषय में सचेत व् सावधान रहे चारों ओर दृष्टि लगाकर अपने राष्ट्र की रक्षा करे |




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1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (06-08-2017) को "जीवन में है मित्रता, पावन और पवित्र" (चर्चा अंक 2688 पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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