Friday, 8 September 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

जीव-जंतुओं के जैसे मनुष्य का भी क्रमगत विकास कैसे होता है
"बाह्य स्वरूप में क्रमागत विकास  के पश्चात आतंरिक स्वरूप में क्रमबद्ध परिवर्तन से मानव में जाति का उद्भव हुवा....."

पाश्विकता से अधिकाधिक परिष्करण ने मनुष्य में उच्च जाति को उद्भिद किया.....'


जनम संगी मातु जनित एक पितु कर संतान |
बंसानुगत कौटुम के होत गयउ निर्मान || १ ||
भावार्थ : - वंशानुगत प्रक्रिया से  जीवन भर साथ रहने वाली माता द्वारा जन्मी एक पिता की संतान से परिवार का एवं इस प्रक्रिया के वंशगत अनुशरण से कौटुम्ब का निर्माण हुवा.....

गठत सील सद चारिता रचत नेम कछु रीत |
संस्कारित होत  बहुरि साकारित भए भीत || २ ||
भावार्थ : -  शील व् सदाचारी वृत्तियों का गठन करते हुवे कतिपय नियम-निर्बंधों एवं परम्परागत रीतियों की रचना के द्वारा वह कुटुंब संस्कारित होता गया, इस प्रकार मनुष्य के विकृत अंर्तजगत ने सुन्दर स्वरूप धारण कर लिया |

बंसानुगत सतत करत जीबिकार्जन काज |
समय वर्ति अस जूह सों निरमय जात समाज || ३ ||
भावार्थ : - प्रचलित धार्मिक पद्धति एवं रीतियों का अनुशरण करने वाले समूह के वंशानुगत जीविकार्जनित कार्य ने जाति का तथा उक्त जाति के समुच्चय ने समाज का निर्माण किया |

इस प्रकार मनुष्य का नाम उसके अंतर्जगत का व् जाति अथवा उपनाम उसके बहिर्जगत का द्योतन बना.....

जैसे : - 'श्रीराम चतुर्वेदी'

श्री राम का तो पता नहीं किन्तु  इसके पूर्वज वैदिक धर्म के अनुयायी थे 'चतुर्वेदी' का अर्थ है ये ब्राह्मण जाति के थे एवं चारों वेदों का ज्ञाता थे | चूँकि इस कौटुम्ब समूह द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी अहिंसा एवं सदाचरण का पालन होता था इसलिए यह समूह ब्राह्मण कहा गया | बहिर्जगत में इसके पूर्वज आजीविका हेतु वेदों के पठन-पाठन का कार्य करते थे.....

जैसे : - 'रामदास केवट '
रामदास : - पूर्वज वैदिक धर्म के अनुयायी
केवट : - नाव खेने का कार्य | चूँकि इस समूह की हिंसा में अनुरक्ति थी इसलिए यह एक निकृष्ट जाति थी |

बाहिर कर क्रिया कलाप भीत जगत कर भाउ | 
बंशानुगत सतत नियत गयउ करत बरताउ || ४ || 
भावार्थ : - बाह्य जगत के क्रिया कलाप तथा अन्तर्जगत के मनोभाव पीढ़ी-दर पीढ़ी स्थानांतरित होकर संतान के व्यवहार को नियंत्रित करते गए  |  बाह्य जगत के  क्रिया कलाप व् अंतर्जगत के मनोभाव उचित होते तब तत्संबंधित वंशज का व्यवहार भी उचित होता |

जैसे पाए अहार जो तैसे होत विचार | 
जैसे होत विचार सो तैसे करत ब्यौहार || ५ || 
भावार्थ : - यह कथन भी सर्वविदित है कि जिसका जैसा आहार होता है उसके विचार भी वैसे ही होते हैं और जैसे विचार होते हैं उसका व्यवहारिक जीवन भी वैसा ही होता है | यदि आहार में हिंसा है तब उसके विचार भी हिंसावादी होंगे यदि हिंसावादी विचार है तब उसका व्यवहारिक जीवन भी हिंसा पर आधारित होगा |

भीतर केरे भाव सों सब करतब संजूत | 
बंशानुगत करतन रत गहत जात  गुनसूत || ६ || 
भावार्थ : - दया एक भाव है और दान एक क्रिया है  अंतर्जगत के भावों से सभी कर्त्तव्य संयुक्त हैं | जब कोई भावजनित कर्त्तव्य वंश से प्राप्त होकर संतान द्वारा निरंतर कार्यान्वित होता है तब वह गुणधर्म का रूप लेकर गुणसूत्रों में संगृहीत होता जाता है जो उसके मूल स्वभाव का निर्धारण करते हैं |

जनम दात बँसानुगत, जनिमन रचे सुभाव । 
तैसी भावै भावना जैसे अंतर भाउ ।१८३७। || ७|| 
भावार्थ : -- संतान को उसका मूल स्वभाव यद्यपि उसके वंश द्वारा प्राप्त होता है । तथापि उसके अंतकरण में जैसे भाव व्युत्पन्न होते हैं उसकी भावनाएं वैसी ही होती है ॥

दानि घर अदानि जनमें, पहरी  के घर चोर। 
अँधियारे घर चन्द्रमा, रयनी के घर भोर ।१८३८। || ८ || 
भावार्थ : -- दानी के घर अदानी भी जन्म लेता है । प्रहरी के घर चोर भी हो जाते हैं ॥ जैसे अँधेरे घर में चन्द्रमा होता है और रयनी  के घर में भोर होती है ॥

चोरीचकारि कलाकारि यह नहि मूल सुभाउ | 
बाताबरन जनित येह  सामाजिक परभाव || ९ || 
तात्पर्य है कि : --  चोरी, दान, भिक्षावृत्ति , नेता गिरी,  कवि,  कलाकारी,  यह वंश द्वारा प्रदत्त मूल स्वभाव नहीं है । यह वातावरण जनित एक सामाजिक प्रभाव है । मनुष्य जैसे वातावरण में रहता है उसकी वृत्तियाँ भी वैसी ही होती जाती हैं ॥

जहाँ इष्ट विशिष्ट संग मिले नेम सुभ रीत | 
कुलीनता संगत मिले तहँ मर्जादित भीत || १० || 
भावार्थ : - जहाँ भद्रता व् उत्तम संस्कारों के साथ उत्तम उत्तम नियम व् कल्याणकारी रीतियाँ मिलती हैं कुलीनता के संगत वहां मर्यादित अंतर्जगत का संयोग होता है |

उत्तम कुलाचार से कुलीनता अर्थात शुद्धता प्राप्त होती है, शुद्ध रक्त अधिकाधिक निरोगी होता है
एक वंशानुगत अहिंसावादी शुद्ध शाकाहारी व् सात्विक तथा अन्य रक्तदाता का ग्रहीता रोगी पर पड़ने वाला प्रभाव शोध का विषय है.....

मात पिता संगत जहाँ पुर्बज के पहचान | 
बंशानुगत लषन हेतु सोई बंस निधान || ११ || 
भावार्थ : -  किसी संतान की वंशानुगत लक्षणों के अध्ययन हेतु माता-पिता के संगत उसके पूर्वजों के गुण समूहों की पहचान प्राप्त होना आवश्यक है |

मानस धर्माचरनगत करतनरत सद करम | 
जीव जगत माझी बसत होत जात सो परम || ११ || 
भावार्थ : - सार यह है कि मनुष्य अंतर्जगत में धर्म आचरण करते हुवे बहिर्जगत में  उत्तम उत्तम कार्य करने में प्रवृत रहे तभी वह जीव-जगत के मध्य निवास करते हुवे सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होता चला जाता है अन्यथा उत्तम वस्त्र धारण कर उत्तम भोजन प्राप्त करने व्  उत्तम स्थान में निवास रत होने के पश्चात भी वह पशु ही है |








Monday, 4 September 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

अधुनै केरि करतूती भाबि नगन जब होइ | 
हाँस करत  इतिहास को अनगढ़ कहि सब कोइ || १ || 
भावार्थ : - वर्तमान तभी सभ्य है जब भविष्य उसे सभ्य कहे | वर्तमान की भोगवादी करतूत से जब भविष्य पूर्व  की भांति नग्नावस्था को प्राप्त हो जाएगा तब वह अपने इतिहास का उपहास करते हुवे उसे महा उजड्ड की उपाधि देगा  || 

स्पष्टीकरण : - एक अनुमान के अनुसार यदि वर्तमान सुखसाधनों के उपभोग में इसी प्रकार प्रवृत्त रहा तो  डेढ़ से दो सौ वर्ष के पश्चात् ईंधन व् ऊर्जा के सभी स्त्रोत समाप्त हो जाएंगे तब जीवन के अन्यान्य संसाधन भविष्य की पहुँच से दूर होते चले जाएंगे, उद्योगों एवं उनके अवशिष्ट से अधिकाधिक भूमि अनुपजाऊ हो जाएगी तब अन्न वस्त्र व् वास हेतु भी उसे अतिसय संघर्ष करना पडेगा..... 

भूरि भूति भोग गह जग कछु खाए कछु पराए | 
सुखसाधन कर सम्पदा निसदिन बिनसत जाए || २ || 
भावार्थ : - जिसप्रकार एक असभ्य को अतिसय भोजन मिले और वह  उसे झूठा करते हुवे  कुछ खाकर  कुछ इधर उधर बिखरा कर उसे नष्ट कर दे,  हमारा वर्तमान भी उसी प्रकार असभ्य है जिसे अतिसय साधन-सम्पति प्राप्त है वह उसे झूठा करके  कुछ का उपयोग करता है कुछ का भोग करता है  उसके इस नित्य उपभोग से वह दिनोदिन समाप्त होती चली जा रही है.....

बर बार भेस बनाए के नगरी गेह बसाए | 
पसुतापन बिसराए बिनु तासु बिलग सो नाए || ३ || 
भावार्थ : - सार यह है कि सभ्रांत होने के लिए उत्तम-उत्तम  आचार-विचारों की आवश्यकता होती है, उत्तम वेश भूसा धारण करके  उत्तम नगरीय आवासों में निवास मात्र से सभ्यता नहीं आती, जबतक मनुष्य पाश्विकता का परित्याग कर बुद्धिवंत न हो तबतक वह पाषाण युग का ही वन मानुष है जो पशु के तुल्य है |

बर बर गेह बनाए के बर बार नगर बनाए | 
तासु बसावन सीख बिनु जग अस्नेह न पाए || ४ || 
भावार्थ : - कंकड़ों व् पत्थरों से निर्मित परिसर को घर नहीं कहते सिंधु घाटी की सभ्यता से विश्व ने उत्तम उत्तम घर बनाना तो सीखा किन्तु घर बसाना नहीं सीखा, उसने उत्तम-उत्तम नगर बनाना तो सीखा किन्तु नगर -बसाना नहीं सीखा | इस अशिक्षा के कारण उसे घर का सुख व् स्नेह प्राप्त नहीं हुवा |

गेह सह जहँ गेहिनी गेह बहुरि सो गेह | 
सुखकारि संतोष संग जहाँ बसत अस्नेह || ५ || 
भावार्थ : - " स्त्री-पुरुष के सम्यक एवं पारस्परिक सु-सम्बन्ध पारिवारिक इकाई का निर्माण करते है"  जहाँ इस प्रकार की पारिवारिक ईकाई हो जहाँ सुख कारि संतोष के संग स्नेह का निवास हो, उसे घर कहते हैं |

सु-सम्बन्ध से परिजनों का प्रादुर्भाव होता है सम्बन्ध जितने पवित्र होंगे परिजन उतने अधिक होंगे,
चिकित्सक प्रथमतस निकट सम्बन्धियों के रक्त का ही परामर्श क्यूँ देते हैं.....?

एक मात- पिता की संतति के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध से रक्त में विकृत होता है, विकृत रक्त रोगों का जनक होता है |
माता, मातामह, परममातामह एवं पिता, पितामह अथवा परम पितामह के भ्राताओं भगिनों अथवा उनकी संततियों के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध नहीं होना चाहिए |

भगवन पाहि पहुँचावै दरसावत सद पंथ |
धर्मतस सीख देइ जौ सोइ ग्रंथ सद ग्रन्थ || ६ || 

भावार्थ : -  जो आप्त ग्रन्थ सद्पंथ दर्शाकर मनुष्य को ईश्वर के पास पहुंचाते हैं जो धर्म चर्या का कर्तव्यबोध कराते हुवे  उसे  सत्य,  दया, दान के सह त्याग व् तपस्या की शिक्षा देते हैं वह ग्रन्थ सद्ग्रन्थ होते हैं |

नगर बहुरि सो नगर नहि  जहाँ न हो सद्पंथ | 
अनपढ़ भा सो नागरी पढ़े नहीँ सद ग्रंथ || ७ || 
भावार्थ : -  वह नगर  नगर नहीं जहाँ कोई सद्पंथ न हो | सद ग्रन्थ धर्मचर्या के कर्तव्य का बोध कराते हैं, जिसके द्वारा मनुष्य का पाश्विकता से परिष्करण होता हैं, शिक्षित होकर भी वह नागरिक अशिक्षित व् असभ्य हैं जो सद्ग्रन्थों का पठन-पाठन नहीं करते |

जहाँ साधुपद चारिता जहाँ धर्म उपदेस |
सोइ देस सुतीरथ सम सोइ देस सुदेस || ८ ||
भावार्थ : - जहाँ सन्मार्ग का चलन हो, जो धार्मिक उपदेशों से युक्त हो वह देश तीर्थ के समान है वही देश वास करने योग्य है  |

यदि अपने देश में जीविका न हो तो क्या उसका त्याग कर देना चाहिए.....नहीं..... क्योंकि भूखे ही सही अपने घर में सभी राजा होते हैं दूसरों के घरों में दास.....वह राजा उत्तम है जिसके घर में प्रजा रूपी सभी जीवों को भोजन प्राप्त हो, वह क्रूर आचरण के द्वारा उत्पीड़ित न होकर सुखी हो.....


 भीतर के संसार एक बाहिर के संसार | 
भीतर धरम अधार है बाहिर कर्म अधार || ९ || 
भावार्थ : - मनुष्य के दो जगत होते हैं एक अंतर्जगत दुसरा  बहिर्जगत | अंतर्जगत मानवोचित धर्म पर व् बहिर्जगत मानवोचित कर्म पर आधारित होता है |

सु-अचार सु-विचार संग कतिपय नेम निबंध | 
अंतर बाहिर कर जगत  सुरुचित रहत प्रबंध || १० || 
भावार्थ : - उत्तम आचार-विचार के संग कुछ नियम व् निबंध से हमारे अंतर-बहिर्जगत सुव्यवस्थित रहते हैं |

उत्तम आचार व् उत्तम विचार कहीं से भी प्राप्त हो उसे ग्रहण करना चाहिए.....

 "जब अंतर्जगत  में गहरी अव्यवस्था होती है, तब हम बहिर्-जगत व्यवस्थित नहीं रख  पाते ॥"
                                                         ----- ॥ विलियम शेख ॥ -----

"वैचारिक पतन से अंतर्जगत में गहरी अव्यवस्था होती है जिससे बहिर्जगत भी अव्यवस्थित रहता है ....."

भूषन बासन बासना बाहिर के संभार  | 
भीतर के सम्भार बिनु दोनहु गहे बिकार || ११-क || 
भावार्थ : - वास व् वस्त्राभूषण बहिर्जगत की व्यवस्था के अंग है अंतर्जगत के वस्त्राभूषण के अभाव में दोनों जगत  में विकार उत्पन्न हो जाता है |

दान बसन मन ताप तन साँच बचन के भेस |
दया ह्रदय करि बास यह अंतर के गनवेस || ११-ख ||
भावार्थ : - दान मन का तपस्या तन का  सत्य वचन का वेश हैं | दया ह्रदय का वस्त्र है यह सब अंतर्जगत के गणवेश है |

जिस मनुष्य के अंतर्जगत को धर्म का आधार प्राप्त न हो वह असभ्य है.....

अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम | 
दास मलूका कह गए सबके दाता राम || 










Thursday, 17 August 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

बाहन ते परचित भयो बिरचत बैला गाड़ि | 
चरनन चाक धराई के जग ते चले अगाड़ि || १ || 
भावार्थ : - बैलगाड़ी की रचना के द्वारा यह विश्व वाहन से परिचित हुवा | वह जब अपने पाँव पर स्थिर भी नहीं हुवा था तब यह देश पहियों पर चलता हुवा प्रगत रूप में अग्रदूत के पद पर प्रतिष्ठित था |

तंत्रहीन जग रहे जब पसु सम धर्मबिहीन |
भारत धर्माचरन रत भगवन में रहँ लीन || २ ||
भावार्थ : - जन संचालन तंत्र से रहित यह विश्व जब धर्म हीन होकर पाश्विकता को प्राप्त था | तब  धर्म के सापेक्ष होकर भगवान की भक्ति में लीन यह राष्ट्र उन्नति के चरमोत्कर्ष पर था |

प्रश्न यह उठता है कि धर्मनिरपेक्ष होकर अब यह कहाँ है.....

प्रगति केरे पंथ रचत देत जगत उपदेस | 
अर्थ ते बड़ो धर्म किए नेम नियत यह देस || ३ ||
भावार्थ : - प्रगति के पंथ का निर्माण कर विश्व को उपदेश देते हुवे इस देश ने कतिपय नियमों का निबंधन किया जिसमें अर्थ की अपेक्षा धर्म को प्रधानता दी |

एहि अर्थ प्रगति पथ रचे  धरम करम कृत सेतु |
जीवन रखिता होइ के बरतिहु जग हित हेतु || ४ ||
भावार्थ : -- पथ की अपनी मर्यादा होती है अर्थ के द्वारा निर्मित यह प्रगति पंथ भी धर्म व् कर्म की मर्यादा से युक्त हो |  जीवन की रक्षा करते हुवे विश्व कल्याण के हेतु इसका व्यवहार हो |

यह संचित भू सम्पदा, करन हेतु उपजोग | 
कहे जग सो सुनै नहीँ कारन लगे उपभोग || ५ || 
भावार्थ : - भूमि की सम्पदा का निरूपण करते हुवे तदनन्तर  इस देश ने कहा यह संचित सम्पदा मनुष्य के उपयोग हेतु है जिससे उसका जीवन सरल व् सुखमय हो |  इस उपदेश को विश्व ने अनसुना कर दिया वह इस संचित सम्पदा का उपभोग करने लगा व् अपना जीवन दुखमय कर लिया  |

धर्म ते बड़ो अर्थ जहँ  मनमानस रत भोग | 
बयसकर निर्वासित तहँ आन बसे बहु रोग || ६ || 
भावार्थ : - जहाँ धर्म के स्थान पर अर्थ की प्रधानता होती है वहां मानव का मनोमस्तिष्क भोगवाद में प्रवृत्त हो जाता है, स्वास्थ को निर्वासित कर वहां बहुंत से रोग आ बसते हैं जिससे मनुष्य की आयु क्षीण होती चली जाती है |

अजहुँ जगत कै  सिरोपर चढ़े बिकासी भूत |
जाग बिनु सब भाग रहे बनन बिनासी दूत || ७ ||
भावार्थ : - विद्यमान समय में विश्व के शीश पर विकास का भूत चढ़ा हुवा है | अचेतावस्था में सभी  एक अंधी स्पर्द्धा के प्रतिभागी होकर प्रगति- पथ पर विनाश के अग्रदूत बनना चाहते हैं |

अजहुँ कर अवधारना ए  होत सुघर सो लोग | 
भवन बसाए नगर बसत भूरि भौति भव भोग || ८ || 
भावार्थ : - सभ्यता के परिपेक्ष्य में वर्तमान की यही अवधारणा है कि जो पाषाणों के भवनों में अधिवासित होते हुवे नगरों में निवासरत हो एवं भौतिक वस्तुओं का अधिकाधिक उपभोग करने में सक्षम हों, वह सभ्य हैं |

साधत जो हित आपुना मानस कहे न कोए | 
जीउ हने हिंसा करे सो तो पसुवत होए || ९ || 
भावार्थ : - जिसका जीवन केवल स्वार्थ सिद्धि के लिए हो वह मनुष्य, मनुष्य कहलाने के योग्य नहीं है | हिंसा एक पाश्विक आचरण है, जो जीवों की हत्या करते हुवे हिंसा में प्रवृत्त रहता हो वह असभ्य है |

अनपढ़ अनगढ़ सोइ जौ मानस मति ते दूर | 
जग में पाप बढ़ाई के होत जात सो क्रूर || १० || 
भावार्थ : - वह मनुष्य असभ्य व् अशिक्षित है जो बुद्धिहीन है | बुद्धिहीनता  संसार में पापों का संवर्द्धन करती हैं इस संवर्द्धन से संसार पापी तथा वह स्वयं क्रूर होता चला जाता है  | उसकी क्रूरता में जब उत्तरोत्तर उन्नति होती है तब प्रथमतः वह कीट तत्पश्चात , मुर्गी फिर गाएं का भक्षण करने लगता है एक समय ऐसा आता है जब वह भ्रूणभक्षी से नरभक्षी होकर अपने माता-पिता का ही भक्षण करने को आतुर हो जाता है |

पशुवत लक्षणों का परिलक्षित होना पाश्विकता है, जो लक्षण मनुष्य को पशुओं से भिन्न करते हैं वह सभ्यता के लक्षण हैं.....,

जोग जुगाए यत किंचित करत भूरि उपजोग | 
धरमवत सद्कर्महि रत सुघर होत सो लोग || ११ || 
भावार्थ : - जो लोग भूत भविष्य व् वर्तमान का ध्यान करके यत किंचित धन्य धान्य संचयन करते हुवे उसका अधिकाधिक उपयोग कर जीवन निर्वाह करते हैं, वह सभ्य हैं | भूत के संयम से ही वर्तमान को सुखकर साधन
प्राप्य हैं वर्तमान संयमित होगा तभी भविष्य को ये साधन प्राप्य होंगे | धर्म के अनुशरण से मनुष्य संयमित होता है यह संयम उसे सद्कार्य करने के लिए प्रेरित करता है ये उत्तम कार्य उसे पशुवत लक्षणों से पृथक करते हैं |













Monday, 14 August 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

भगवन पाहि पहुँचावै दरसावत सद पंथ |
धर्मतस सीख देइ सो जग में पावन ग्रन्थ || १ || 
भावार्थ : -  जो ग्रन्थ मनुष्य का मार्गदर्शन करते हुवे उसे ईश्वर के पास पहुंचाता हो | जो ग्रन्थ धर्म का अनुशरण कर मनुष्य को  सत्य,  दया,  दान के सह  त्याग व् तपस्या की शिक्षा देता हो वह ग्रन्थ पवित्र होता है.....

जो ग्रन्थ अपना देश, अपनी मातृभूमि छुड़वाता हो वह ग्रन्थ पवित्र नहीं होता.....

अजहुँ के चालि देख पुनि जनमानस कू लेख | 
अगहुँ धरम सम होइगा संविधान निरपेख || २ || 
भावार्थ विद्यमान समय की चाल का निरिक्षण व् जनमानस का अवलोकन करके ऐसा प्रतीत होता है कि आगे आगे धर्म के समान संविधान भी निरपेक्ष होने लगेगा |

करत पराई चाकरी करतब तासु अधीन |
होत जात निज देस सो होइब देस बिहीन || ३ ||
भावार्थ : - पराए देशों की चाकरी  करते करते उसे अपने अधीन करने वाले, देशवाल होते हुवे भी देश से विहीन हो कर दुत्कारे जाते हैं ||

आन देस अनगढ़ होत रहँ जब नंग धडंग | 
रहे सुघड़ एहि देस तब गहे सैन चतुरंग || ४ || 
भावार्थ : - अन्य राष्ट्र असभ्यता को प्राप्त होकर जब अशिक्षित व् नग्नावस्था में थे,  तब सभ्यता की परकाष्ठा को स्पर्श करते हुवे यह भारत चतुरंगिणी वाहिनी का धरता हुवा करता था |

धर्म वट धुजा पट धरे रहे सीव के संग | 
पथ पथ चरन पखारती तीनी जलधि तरंग || ५ || 
भावार्थ  : - धार्मिक  एक रूपता की ध्वजा को धारण किये यह देश सीमाओं से चिन्हित था |  तीन समुद्रों से उठती तरंगे पथ पथ पर इसके चरणों का प्रक्षालन करती थी |

हिममंडित मौली मुकट हृदय जमुना गंग | 
प्रथम किरन करि आलिँगन गगनपरसते श्रृंग || ६ || 
भावार्थ : - जिसका ह्रदय गंगा -यमुना जैसी नदियों के पावन जल रूपी रक्त की वाहिनियों से युक्त है | हिम मंडित हिमालय जिसके मस्तक का मुकुट है | सूर्य की प्रथम किरणों का आलिंगन करती हुई जिसकी गगनचुम्बी शिखाएँ हैं |

बस्ति बस्ति रहेउ बसत नव पाहन जुग सोह | 
अबर बसन बिन बास जब रहे सघन बन खोह || ७ || 
भावार्थ : - पाषाण से नवपाषाण युग में प्रवेश करते हुवे वह भारत तब बस्तियों में निवासरत था, जब अन्य देश के निवासी वस्त्र व् आवास से रहित होकर सघन वनों के भीतर गुफाओं में रहा करते थे ||

करष भूमि करषी कर लच्छी बसी निवास | 
भाजन सों भोजन करे होत अगन बसबास || ८ || 
भावार्थ : --  भूमि को कर्ष कर जब इस देश ने कृषि का आविष्कार किया और भूमिपर व्याप्त धन रूपी लक्ष्मी घरों में निवास करने लगी तब विश्व अर्थ व्यवस्था से परिचित हुवा | भाजन में भोजन करना विश्व ने इस देश से ही सीखा |  इस देश ने ही अग्नि का प्राकट्य किया और उसे घरों में बसाया | 

प्रगति के पुनि पथ रचत ताम धातु करि टोह | 
अगजग धातु जुगत करे टोहत काँसा लोह || ९ || 
भावार्थ : - तांबा, कांसा लोहादि  धातुओं की खोज  करके विश्व को धातुमय करते हुवे इस देश ने उस प्रगति पथ की रचना की | 

बरन हीन जग रहे जब  आखर ते अग्यान | 
भूषन भूषित भाष ते लेखे बेद पुरान || १० || 
भावार्थ : -   शब्दहीन यह विश्व जब अक्षरों से भी अनभिज्ञ था तब इस देश ने स्वर-व्यंजनों व् अलंकारों द्वारा विभूषित भाषा से वेद पुराण जैसे ग्रन्थ लिखे | औपनिवेषिक शोषण के कारण यह देश अशिक्षित होता चला गया |

हल हथोड़े गढ़त जगत जुगत करे कल यंत्र  |
मानस जन कहतब रचे जन संचालन तंत्र || ११ || 
भावार्थ : -  जब इस देश ने हल हथौड़े गढ़े तब यह विश्व यन्त्र-संयत्र से युक्त हुवा | समूह में निवासित मानव समुदाय को 'जन' सम्बोधित करते हुवे 'जन संचालन तंत्र' की रचना की | राजतंत्र एवं लोकतंत्र इस देश की ही परिकल्पना थी |









Thursday, 10 August 2017

----- || दोहा-एकादश || -----


हाथोँ हाथ सूझै नहि घन अँधियारी रैन | 
अनहितु सीँउ भेद बढ़े सोइ रहे सबु सैन || १ || 
भावार्थ : -- जहाँ हाथों हाथ सूझता न हो जहाँ नीति व् नियमों का अभाव के सह अज्ञानता व्याप्त हो | जहाँ शत्रु सीमाओं को भेद कर आगे बढ़ रहे हों जहाँ सेना गहन निद्रा में निमग्न हो वहां जनमानस को चाहिए कि वह सचेत व् सावधान रहे |

रतनधि धर जलधि जागै,जागै नदी पहार | 
एक पहराइत जगै नहि ,जागै सबु संसार || २ ||
भावार्थ : - रत्नों की निधियां संजोए जलधि जागृत है नदी जागृत है पहाड़ जागृत है सारा संसार जागृत है केवल एक पहरेदार जागृत नहीं है |

निँद त्याज कर जागरन जन जन पूछ बुझाए | 
पितु धन सम्पद जान के परबसिया कर दाए || ३ || 
भावार्थ : - सुषुप्त अवस्था  त्याग कर जनमानस भी जागृत हो और सत्ता के लालचियों से प्रश्न करे कि राष्ट्र की भूमि को खंड-खंड कर उपनिवेशियों को दे दी गई क्या इन्होने इस राष्ट्र को अपनी पैतृक सम्पति समझ रखा है |

१९६० ई .के ९ वे संशोधन का कारण पूछे जिसमें देश  के टुकड़े कर एक संधि के द्वारा बेरुबारी व् खुलना आदि क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिए गए थे |


खंड खंड करि देस जे अखंड राग अलाप | 
जागरित जन को चाहिये पूछे तिनके पाप  || ४ || 
भावार्थ : -- अखंडता के राग का अलाप करते जिन्होंने इस देश को खंड-खंड किया और करते रहेंगे  | जागृत जनमानस को चाहिए वह उनके पाप पूछे |

अधिकार ते सजग होत करतब सोंहि सचेत | 

पलछन चिंतन रत रहत  करे देस सो हेत || ५ || 
भावार्थ : -- स्वाधिकार के प्रति सजग व् स्व-कर्तव्य के विषय में सचेत रहते हुवे जो आत्मचिंतन से अधिक राष्ट्र के चिंतन में लीन रहता हो उसे अपना राष्ट्र प्रिय होता है,यह जागरूक जनमानस का भी लक्षण है |

तरु बलयित जस बेलरी तासु कोस अवसोस | 
बढ़त बढ़ावत आपनी बासत जात पड़ोस || ६ || 
भावार्थ : -- वृक्ष में वलयित बेल वृक्ष के ही पोषण कोष का अवशोषण कर अपनी वृद्धि करती हुई जिस प्रकार पड़ोस में बसती चली जाती है उपनिवेशियों का स्वभाव भी उसी प्रकार का होता है |

देसवाल हो जासोइ पाए धरनि धन धाम | 
बैर बँधावत तासोइ चढ़त करे संग्राम || ७ || 
भावार्थ : -जो  देश  भूमि धन व् सदन से युक्त कर इन्हें देशवाल बनाते हुवे जगत में प्रतिष्ठित करता है,  ये उसी देश से वैर बाँधते उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुवे नित्य संग्राम के लिए आतुर रहते हैं |

पीर नहीं पर एकै की यह अगजग की पीर | 
जेहि तरु तिन पोषि तेहि काटैं धीरहि धीर || ८ || 
भावार्थ : - उपनिवेशियों द्वारा प्रदत्त यह पीड़ा किसी एक राष्ट्र की न होकर उन सभी राष्ट्रों की है जहाँ की ये बसे हुवे हैं ये जिस वृक्ष से परिपुष्ट होते हैं उसी वृक्ष की जड़ें काटने में लगे रहते हैं  इनकी अनंतिम परिणीति विभाजन है  | 

जुग लग सम्राज वाद पुनि उपनिवेसि कर सोस | 

भारत की प्रगति दो दिन चली अढ़ाई कोस || ९ || 
भावार्थ : -- इस प्रकार युगों तक साम्राज्यवादी एवं औपनिवेशिक शोषण होने के कारण प्रगति के पथ पर भारत की गति अत्यधिक धीमी हो गई, शोषण के ये कारण इस देश में अब तक व्याप्त हैं | अन्य देशों को इससे बच के रहना चाहिए |

जग माहि एक भगवन की कृपा अकारन होइ | 
प्रति कारज न त होत है कारन कोइ न कोइ || १० || 
भावार्थ : - संसार में एक ईश्वर की कृपा ही अकारण होती है अन्यथा प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण होता है |

साँसत घर की कोठरी संविधान को मान | 
बदले घर सो आपुना रचिता केर समान || ११ || 
भावार्थ : - उपनिवेशकों द्वारा शोषण एवं योग्यता की उपेक्षा करने कारण भारत के संविधान को पीड़ादायक कालकोठरी की संज्ञा दी गई और जिस प्रकार इसके रचेयता ने तो धर्म परिवर्तन किया था उसी प्रकार कुछ लोगों ने संविधान ही परिवर्तित कर लिया |

बसा बसेरा बिहुर के निसदिन करत पलान | 
देस पराए जा बसे केतक प्रतिभावान || १२ || 
भावार्थ : - अपने बसे बसाए राष्ट्र को छोड़ कर नित्य पलायन करते हुवे फिर कितने ही प्रतिभावान पराए देशों में निवासरत हो गए |

'धर्म को परिवर्तन न कर धर्म में परिवर्तन करो'
'संविधान को  परिवर्तन मत करो संविधान में परिवर्तन करो'
पण यह है कि वह परिवर्तन कल्याणकारी हो.....













Friday, 4 August 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

बसति बसति बसबासता मिलिअब पर समुदाय | 
बसे बसेरा आपुना केहि हेतु कर दाए || १ || 
भावार्थ : - यदि एक पराए देश का सम्प्रदाय जब विद्यमान भारत के वस्ति वस्ति में निवासित है तब उसका विभाजन कर एक बसा बसाया राष्ट्र उसे किस हेतु दिया गया |

एक नहीं दो नहीं तीन तीन राष्ट्र इन्हें दिए गए तथापि ये भारत की छाँती में मूंग दल रहे हैं इनके लिए इस देश का और कितना विभाजन होगा.....?


आन बसे परबासिया भए बिनु देस सदेस |
बिरावन भयउ भारती होत जात निज देस || २ || 
भावार्थ : -- अब देश में बसे पराए,  देश रहित होते हुवे भी देशवाल हो गए |  जो देशवाल थे, राष्ट्रिक थे वह राष्ट्र विहीन होकर राष्ट्र के स्वत्वाधिकार से वंचित हो गए, उनके लिए १९४७ की स्वतंत्रता अभिशाप सिद्ध हुई |

स्पष्टीकरण : - १९४७ के भारत विभाजन में भारत के मूल निवासी जो विभाजित देश में निवास करते थे उन्हें भारत लाया नहीं गया अब वह अभारतीय कहलाते हैं |

खंड खंड होतब अजहुँ भयऊ भारत सेष | 
अस तो हो रहि जाएगा सनै सनै अवसेष || ३ || 
भावार्थ : -- विद्यमान समय में स्थिति यह है कि यह अखंड भारत खंड-खंड होकर शेष भारत में परिवर्तित हो गया है  यदि यही अनुक्रम चलता रहा तो यह अवशेष मात्र होकर रह जाएगा  |

जनमानस भरमाइ के करतब खंडहि खंड | 
अगजग सबहि कहत फिरें यह तो देस अखंड || ४ ||  
भावार्थ : - जनमानस को भ्रमित करके इस देश को खंड-खंड किया | और संसार भर में ये सत्ता के लालची कहते मिले कि यह देश अखंड है | यह देश खंड- खंड हो चुका है जनमानस इस भ्रम में न रहे कि यह अखंड भारत है अब यह जितना है उतना को तो बचा लें.....

स्पष्टीकरण : -- १९७६ के ४२वें संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में  'अखंडता' शब्द भी जोड़ा गया..... 

स्वाधीनता सबद तब होतब अर्थ बिहीन | 
रजे राज सो देस में जिनकर रहे अधीन || ५ || 
भावार्थ : -- स्वाधीनता शब्द तब अर्थ विहीन हो जाता है जब देश में वही राज करता हो जिसके की वह अधीन था |

स्वत्वाधिकार तैं जो स्वाजन्य परिरोधि | 
सो बिधि सो सबिधायनी होत स्वतोबिरोधि || ६ || 
भावार्थ : - किसी विधि द्वारा विहित अधिनियम अथवा उसके उपबंध जब मूल निवासियों के स्वत्वाधिकार को परिरुद्ध करते हैं तब वह संविधान अपने ही राष्ट्र का विरोधी होता है |

दास करत गोसाइयाँ गोसाईँ कर दास | 
सासन करे बिलास जब जन जन होत उदास || ७ || 
भावार्थ : -   जब जनमानस अपने अस्तित्व के बौद्धिक तत्वों से अनभिज्ञ होते हुवे सुषुप्त और शासन निर्द्वन्द्व सुख उपभोग में मग्न होता है, तब स्वामी स्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर दासत्व को तथा दास  उन अधिकारों से संपन्न होकर स्वामी के पद को प्राप्त होते जाते हैं |


अचेतन होत जहँ जन मानस रहे उदास | 
तहँ कर सब सुख सम्पदा बसे परायो बास || ८ || 
भावार्थ : --  जहाँ जनमानस अपने अस्तित्व के बौद्धिक तत्वों से अनभिज्ञ होते हुवे सुषुप्त अवस्था में होता है वहां की सभी सुख सम्पदाएँ पराए देशों में जा बसती हैं और वहां निर्धनता का वास हो जाता है |

उदर परायन होइ के सोते रहे न कोए | 
जगत परायन संग अब देस परायन होएं || ९ || 
भावार्थ : - जगत के अस्तित्व में किसी राष्ट्र  का अस्तित्व निहित होता है, राष्ट्र के अस्तित्व में उसके जनमानस का अस्तित्व निहित होता है | जनमानस छुद्र स्वार्थों के वशीभूत होकर उदर की पूर्ति करने में न लगा रहे कि वह सुषुप्त अवस्था का त्याग कर स्व-कर्त्तव्य के विषय में सचेत होते हुवे जागृत रहे और जगत का चिंतन करते हुवे देश का चिंतन करे |

परबसिया जहँ दरसिया बसबासत सब कूल | 
कहँ भारत कहँ भारती कहँ भारत के मूल || १० || 
भावार्थ : - एक जागृत जनमानस को संविधान से यह प्रश्न अवश्य करना चाहिए कि सीमावर्ती प्रदेशों में जहाँ तक देखो वहां पराई शाखाएं ही निवास करती दिखाई देती हैं ऐसी परिस्थिति में भारत कहाँ है, भारतीय कहाँ हैं, और भारत की वह जड़ें कहाँ हैं जिनसे यह राष्ट्र परिपोषित हुवा है |

सासन भोगे बिषय रस डीठ धरे चहुँ कोत | 
रूखे जन को चाहिये जोगे जगरित होत || ११ || 
भावार्थ : - शासन विषय जनित रसों का आनंद लेने में निमग्न है | सुषुप्त जनमानस को चाहिए कि वह जागृत होकर अपने स्वत्व के विषय में सचेत व् सावधान रहे चारों ओर दृष्टि लगाकर अपने राष्ट्र की रक्षा करे |




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Friday, 28 July 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

बथुरत पूला आपना, बँधेउ पराए पूल | 
भरम जाल भरमाइ के  बिनसत गयउ मूल || १ || 
भावार्थ : --भारत वस्तुत: चार धार्मिक समुदायों के कुटुंब का राष्ट्र है, यह  कुटुंब तब बिखर गया जब इसमें  उस पराए कुटुंब को भी सम्मिलित किया गया जिसने उसे दास बनाया  था  |  तत्पश्चात इन्हें अपना कहते हुवे एक भ्रम का जाल बिछाया गया जिसके बहकावे में आकर भारत की मौलिकता नष्ट-भ्रष्ट होती चली गई |

साख बिरानि राख करत, करत मूल निर्मूल |
जग अनभै अधिकार रचत मौलिकता गए भूल || २ || 
 भावार्थ : -- अपने मूल को निर्मूल कर अपनी मौलिकता को छिन्न-भिन्न करके  एक पराई साम्प्रदायिक शाखा की रक्षा करते हुवे ऐसा अधिकार परिकल्पित किया गया जो विश्व में किसी  राष्ट्र के संविधान ने नहीं किया था  | 


बिरावन भयउ बहोरी  सासन के अधिकारि | 
अखिल जगत कर देस जौ कतहुँ दरस नहि पारि || ३ || 
भावार्थ :- जो राष्ट्र निर्माण के मूलभूत नहीं हैं उसे शासन करने का अधिकार प्राय: विश्व के किसी भी राष्ट्र ने नहीं दिया है | जो न केवल राष्ट्र निर्माण के मूलभूत नहीं हैं जिन्होंने उसे दास भी बनाया, भारत के संविधान ने ऐसे  साम्राज्य वादी समुदाय को पुनश्च शासन करने का अधिकार दे दिया |

 लागि होत भयो पुनि सो  संविधान निरमाए |  
अपने अपने देस में सब बिधि करत पराए || ४ || 
भावार्थ : -- ततश्चात एक दिन निर्मित होकर वह संविधान रातोंरात देश पर लागू भी हो गया | लोगों को पता भी नहीं चला कि उस संविधान में देश के मूलनिवासियों को अधिकारों से विपन्न कर पराया कर दिया गया था |

सीँउ भए बिनु सीँउ भयो दिए पट बिनहि द्वार | 
यह मूरख का देस कह राज करे संसार || ५ || 
भावार्थ : -- सीमाओं के होते हुवे भी यह देश सीमा से विहीन रहा क्यों कि इसमें एक ऐसे द्वार का निर्माण किया गया जिसमें पट ही नहीं थे |  उस द्वार पर अंकित किया गया कि यह मूर्खों  का  देश है यहाँ कोई भी कभी भी कहीं भी आ-जा सकता है और इसपर शासन भी कर सकता हैं |

एक तो भारा आपना भयऊ  भारि अपार | 
बहुरि संभारन कांधरा दियो परायो भार || ६ ||   
भावार्थ : --चार सम्प्रदायों के कुटुम्ब के देश का अपना भार ही भारी-भरकम था फिर उस के कन्धों पर पराए सम्प्रदाय के पालन-पोषण का भार भी लाद दिया गया |

बोहनहारा हारिया बोह परायो बोह | 
दारिद रेखा बीच ते नीच भया ता सोंह || ७ || 
भावार्थ : -- अपने दायित्व  के साथ दुसरों का भारी भरकम दायित्वों को वहन करने के  कारण  इस देश का कंधा शिथिल होकर क्लांत गया जिसे निर्धन रेखा के मध्य में स्थित होना था वह कुटुम्ब निर्धन रेखा के नीचे आ गया |

प्राग समउ ए भारत भुइ चहुँ दिसि लिए बिस्तार | 
सुगठित एक छत रूप दिए अन्तर देसिक धार || ८ || 
भावार्थ : - प्राचीन समय में भारत का भूखंड चारों दिशाओं में विस्तार को प्राप्त होकर सुव्यवस्थित राजतांत्रिक क्षेत्रों की लघु ईकाइयों का समूह था | राष्ट्रीयता की धारा के इस अंतर विस्तार को सुसंगठित कर तदनन्तर एक प्रभुसत्तात्मक स्वरूप दिया गया |

एवम एकीकार भुइँ करि भए भारत गनराज |
स्वारथ परायन हेतु पुनि करिअब बहुंत विभाज || ९ ||  

भावार्थ : - इस प्रकार राज्य की इन लघु इकाइयों एवं इसके निवासियों को एक सीमा रेखा में आबद्ध करते हुवे इसके विस्तारित भूखंड का एकीकरण किया गया तदनन्तर प्रभुसत्ता संपन्न वैधानिक गणराज्य का स्वरूप धारण कर विश्व में यह एक राष्ट्र के रूप में स्थापित हुवा | किन्तु अपना हित सिद्ध करने वाले स्वार्थी तत्त्वों के  कारण यह वर्तमान में खंड-खंड हो गया |

पूल परयो हेतु पुनि खींचे पुनि एक रेख | 
बसा बसाया बासना दे तिन पेटे लेख || १० || 
भावार्थ : -- एक राष्ट्र को निर्मित करने में पीढ़ियों का रक्त लगता है; इस यथार्थ की उपेक्षा करते हुवे पराए देश के एक पराए समुदाय के लिए पुनश्च एक रेखा खिंच कर भारत को खंड-खंड करते हुवे एक सुव्यवस्थित राष्ट्र उनके नाम कर दिया |

अब लगि को न जनाइया भंजत  भारत सेतु | 
करतब लहुरा देस किए खंड खंड किन हेतु || ११ || 
भावार्थ : - भारत की सीमाओं का विभंजन करते इस विशाल राष्ट्र को लघुता प्रदान करने के कारण क्या थे | इसे किस हेतु खंड-खंड किया यह अब तक किसी भारतीय को ज्ञात नहीं है |

 

Monday, 24 July 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

श्रम करम गौन करत तब भयऊ अर्थ प्रधान | 
पददलित भए दीन हीन गहे मान धनवान || १ || 
 भावार्थ : -- श्रम व कर्म को गौण कर जन संचालन व्यवस्था में अर्थ प्रधान हो गया,  इस प्रधानता से दरिद्र पद दलित होने लगे व् धनाढ्य मान्यवर हो गए  |

होइब अर्थ बिहीन जो जिनके भेस भदेस | 
विलासित भवन तिन्हने निरुधित भयउ प्रवेस || २ || 
भावार्थ : -- अब जो कोई दरिद्र है जिसका भेष भद्दा है चमचमाते भवनों एवं गगन चुम्बी अट्टालिकाओं में  उसका प्रवेश निषिद्ध हो गया |

अर्थ प्रधान बिधान ने दियो रेख एक खींच | 
ऊँचे कू  ऊँचे कहे नीचे कू कह नीच || ३ || 
भावार्थ : -- अर्थ की प्रधानता को स्वीकार्य करने वाले संविधानों ने एक रेखा खींची जिसे निर्धन रेखा कहा गया | जो इस रेखा के ऊपर होते वह अब  सभ्रांत हो गए और सभ्य कहलाने लगे जो इसके नीचे होते वह क्षुद्र होकर
अछूत हो गए और नीच कहलाने लगा |

अँखुवा केरे आँधरे जो को गाँठ पुराए | 
सोइ सत्ता सूत गहे सोइ बिधिक पद पाए || ४ || 
 भावार्थ: - अब जिसकी बाहु में धन का बल होता, वही सत्ता का सूत्रधार होकर संवैधानिक पदों को प्राप्त होता  फिर वह निर्बुद्धि अपराधी, चरित्र हीन, दुराचारी ही क्यों न हो | जिसके पास सत्ता होती उसके पास पैसा होता और वह निर्धन रेखा के सबसे ऊपर होता |

इस प्रकार लोकतंत्र पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसे के चक्कर में पड़ गया

राजू : - बोले तो इस चक्कर से लोकतंत्र का सत्यानास हो गया.....

ऐसे वैसे कैसेउ अर्थ रहे तब अर्थ |  
जोइ अर्थ बिहीन रहे अब सो होइ ब्यर्थ || ५ || 
 भावार्थ : -- अर्थ-प्रधान व्यवस्था में अर्थ की उपलब्धि से ही व्यक्ति की उपयोगिता सिद्ध होती, अर्थात  ऐसा वैसा हो चाहे कैसा हो पैसा होना आवश्यक हो गया, अब  कोई  बुद्धिजीवी, सदाचारी व् चरित्रवान ही क्यों न हो अर्थ की अनुपलब्धता से वह अनुपयोगी कहा जाने लगा |

समता वाद प्रस्तावत भारत के सविधान | 
भीतर भेदभाव भरे बाहिर कहत समान || ६ || 
भावार्थ : -- समता वाद को  प्रस्तावित करते हुवे  २६ जनवरी १९५० से भारत में एक नया संविधान लागू किया गया |  बाह्य स्वरूप में यद्यपि समान नागरिक संहिता का उल्लेख किया गया था किंतु इसकी आतंरिक विषय वस्तु भेद-भाव से परिपूर्ण थी |  सरल शब्दों में कहें तो इसके बाहर कुछ और था अंतर में कुछ और |

सोइ संबिधि सविधायनि बिधेय सोइ बिधान |
जासु देस समाज सहित होत जगत कल्यान || ७ || 
भावार्थ : --  वह शासन- प्रबंध,प्रबंधित करने योग्य है तथा वह विधान, संविधान के अंतर्गत नियम व् सिद्धांत के रूप में स्थापित करने योग्य है जो तत्संबंधित व्यक्ति, समाज व् राष्ट्र सहित विश्व कल्याण के प्रयोजन हेतु हो |

अर्थ प्रधान बिधान ने जने बरन पुनि चारि | 
समता वाद बिसार के भेद भाव करि भारि || ८ || 
भावार्थ : -- अर्थ प्रधान विधान के द्वारा भारतीय जनमानस पुनश्च चार वर्ग  में विभक्त हो गया जो जाति पर आधारित न होकर धन की उपलब्धता पर आधारित  था | समता-वाद की अवहेलना करते हुवे  इन वर्गों में अतिसय भेदभाव- किया जाने लगा |

स्पष्टीकरण : -- वैदिक काल में वेदों में एक जन-संचालन व्यवस्था का उल्लेख है जिसमें भारत के मूलनिवासी जातिय आधार पर चार वर्गों में विभक्त थे | ऐसा माना जाता है कि जैन और बौद्ध धर्म का अभ्युदय इस काल के पश्चात हुवा |  मुसलमानों एवं अंग्रेजों द्वारा भारत को दास बनाकर उसपर राज करने के पश्चात भी मूल निवासियों में वही परिपाटी चली आ रही थी |

शासक कहँ सो सही कहँ करतब सत्ता वाद | 
जो कोई नहि नहीं कहँ ताको संग विवाद || ९ || 
भावार्थ : - संविधान आतंरिक विषय वस्तु में सत्तावाद का प्रतिपादन करते हुवे कहा गया कि सत्ता धारी की कही सर्वमान्य होगी |  अब जो सत्ताधारी कहता वही सही होता, यदि कोई इसका विरोध कर उस सही नहीं कहता वह विवादित कहा जाने लगा |

सत्ता धारी कहँ अलप सोइ अलप कहलाए | 
अधिकाधिक होइ चाहे जोइ जगत समुदाय || १० || 
भावार्थ : -- वैश्विक पटल पर चाहे कोई अधिकाधिक क्यों न हो सत्ताधारी जिसे अल्प कहते वही अल्प होता |


सासक कह यह पद दलित, यह निर्धन असहाय | 
पद कलित होत जात सो घन धन दल बल पाए || ११ || 
भावार्थ :--  सत्ताधारी जिसे कुचला हुवा, निर्धन व्  असहाय कहते वही दलित कहलाता वह फिर उन्हें पद पर प्रतिष्ठित क्यों हो उसके पास अपार वैभव क्यों न हो,  उसके साथ करोड़ों लोगों के दल का बल क्यों हो |

ऐसे दलित के पैर के नीचे फिर न जाने कितने ही कुचले गए.....


Tuesday, 18 July 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

धरम अनादर मति करो होत जहाँ अवसान | 
ताहि  कंधे पौढ़त सो पहुँचे रे समसान || १ || 
भावार्थ : --  सत्य,तप,दया और दान आदि धर्म साधारण धर्म है जो सभी मनुष्यों होना चाहिए |  विशिष्ट धर्म का भी अनादर नहीं करना चाहिए, जीवन रूपी संध्या के अवसान होने पर धर्म के कंधे उठकर वह श्मशान पहुंचता है |

मुए जगत निरबसन कियो  धरम दियो ओहार | 
बासत पुरबल देहि कै करिया सो उद्धार || २ || 
भावार्थ : - मृत्यु के पश्चात दुनिया जब मनुष्य को निर्वस्त्र करती है, तब धर्म ही उसे वस्त्र देता है |  दुर्गन्ध आने के पूर्व धर्म ही मृत शरीर का उद्धारकर्ता है |  

भोजन बासा बसन जब भै जिअ के चिन्हारी | 
ताहि प्रबंधन अर्थकर करिअब नीति अनुहारि || ३ || 
भावार्थ : -- सभ्यता के पश्चात जब भोजन वस्त्र व् आवास मनुष्य के  जीवन हेतु आवश्यक साधन हो गए तब कतिपय नीतियों का अनुशरण करते हुवे उसने अर्थ को प्रबंधित किया |

अर्थात : --  मनुष्य द्वारा अर्जित किये गए धन को किस प्रकार प्रबंधित किया जाए कि वह सरलता पूर्वक इन आवश्यक साधनों को प्राप्त कर सके यह उपक्रम अर्थ -प्रबंधन कहलाया |

दूसरे शब्दों में : -- सार्वजनिक राजस्व और उसके आय-व्यय की व्यवस्था ही अर्थ-व्यवस्था है |

भोजन बासा बसन जब भै जिअ के चिन्हारी | 
ताहि प्रबंधन अर्थकर करिअब नीति अनुहारि || ३-क || 
भावार्थ : -- सभ्यता के पश्चात जब भोजन वस्त्र व् आवास मनुष्य के  जीवन हेतु आवश्यक साधन हो गए तब कतिपय नीतियों का अनुशरण करते हुवे उसने अर्थ को प्रबंधित किया |

जब गगन तेउ औतरी  घन बासिनि बिद्युत | 
बहुतक साधन संग सो भयऊ जटिल बहूँत || ३-ख || 
भावार्थ : -- और जब घन निवासिनी का धरती पर प्राकट्य हुवा और विद्युत् का आविष्कार हुवा तब इन आवश्यक हेतु के सह अन्यान्य संसाधनों की व्यवस्था के फलस्वरूप अर्थ नीतियां जटिल होती गई | 

एक अर्थ हेतु स्वारथ एक परमारथ हेतु | 
यहाँ अधर्माधीनता यहाँ धरम के सेतु || ४ || 
भावार्थ : -- सत्ता के लालच ने अर्थ को दो भागों में विभक्त कर दिया | अब अर्थ एक स्वहित के हेतु और एक परहित के हेतु व्यवस्थित होने लगा | जहाँ  स्वहित हेतु व्यवथित होता वहां यह अधर्म के अधीन होता जहाँ परहित के हेतु व्यवस्थित होता वहां यह धर्म के द्वारा मर्यादित रहता, अर्थात उत्तम रीति से यह प्राप्त किया जाता और उत्तम नीति से यह व्यय किया जाता.....

लोह लेत जग लोहिता भयउ लोह कर जोइ   | 
दोहत कोयर सब कतहुँ कोयर कोयर होइ || ५ || 
भावार्थ : - मध्य कालीन युग में लोहा पृथ्वी से निष्कासित होकर जब मनुष्य के हाथ में आया तब कलह-क्लेष से  उसने संसार को रक्त से लाल कर दिया  | आधुनिक काल के प्रारम्भ में जब कोयले का भी दोहन होने लगा तब उसकी करनी से चारों ओर मलिनता व्याप्त हो गई |

छूटत गया बधावना छूटत गए सब ग्रंथ | 
कलि का चाका गति गहा लोहल भए जब पंथ || ६ || 
भावार्थ : -- पृथ्वी के संग्रह का रहस्योद्घाटन होते ही उसकी संचित धन-सम्पदा  शनै: शनै:  रिक्त होने लगी | जब वह लोहपंथी हो गई तब आधुनिक काल का पहिया द्रुत गति से संचालित होने लगा |  

आठ जुग के ठाट जुटे, परे देह पर पाँखि | 
चरन धरा कू छाँड़ के  गगन धरे तब लाखि || ७ || 
भावार्थ : -- मानव के संसाधन अब देखते ही बनते थे उसकी देह में जैसे पंख उग आए हों उसके चरण धरती पर न पड़कर गगन पर धरे दिखाई पड़ने लगे   | जितनी सुख-सुविधाएं उसने इस एक काल में संकलित की  उतनी सभी कालों को मिलाकर भी नहीं की  |  १०० -१५० वर्षों में पृथ्वी का जितना दोहन हुवा विगत कालों में उसका १% भी नहीं हुवा |

समय पुरब उद्यम बिनहि, भाग तेउ अधिकाह  | 
पाप करम उपजाइया सुख साधन करि लाह  || ८ || 
भावार्थ : -- उद्यम के बिना समय से पूर्व और भाग्य से अधिक सुख साधनो की लालसा ने कुत्सित कर्मों को उत्पन्न किया  |

अधिकाधिक की दौड़ जनि जोड़ जोड़ की होड़ | 
लाखोँ लाख लिखा भयो  कौड़ी भयउ करोड़  || ९ || 
भावार्थ : -- अधिकाधिक सुख उपभोग के फेर ने फिर संग्रह करने की प्रतिस्पर्धा उत्पन्न की अब करोड़ों की धन-सम्पत्ति अल्प व्  लाखों की धन-संपत्ति अत्यल्प हो गई |

कतहुँ त भ्रष्ट चरन चरे, कतहुँ त अत्याचार | 
आचरन करि कदाचरन बिकरित भयउ बिचार || १० || 
भावार्थ : -- यह विकृत विचारों की परिणीति थी कि निर्द्वन्द्व सुख-उपभोग व्  अधिकाधिक संग्रह की प्रवृत्ति ने   कहीं भ्रष्टाचार तो कहीं अत्याचार का चलन कर दिया , सदाचरण विलुप्त होने लगा कदाचरण ही अब सदाचरण हो चला |

दुराचरन अपनाए भए  करतब काज मलीन | 
धर्म सेतु बिसुरत अर्थ होतब पाप अधीन || ११ || 
भावार्थ : -- दुराचरणों को अंगीकार किये जाने के कारण  कुत्सित कार्य करणीय कार्य हो गए परिणामतस  अर्थ धर्म की मर्यादा से विहीन होकर पाप के अधीन हो गया |









Saturday, 15 July 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

अबिकसित तन मति अरु मन बिनु कारज कुसलात | 
अस जनमानस संग सो  देस दरिद कू पात || १ || 
भावार्थ : -- जहाँ शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास से न्यून व् कार्य कुशलता के अभाव से युक्त जनमानस हो वह राष्ट्र दरिद्रता को प्राप्त होता है.....

जहँ नही मितब्यईता जहँ ब्यसन के बास |
जहँ कर उद्यम हीन तहँ दलिदर करे निवास || २ ||
भावार्थ : - जिस राष्ट्र में मितव्यविता न हो व्यसनों का वास हो, हस्त परिश्रम से हीन हों उस राष्ट्र में दरिद्रता निवास करती है.....

निर्द्वंद्व सुख भोग जहां अधिकाधिक अभिलास |
नव नवल प्रत्यास तहाँ होत दरिद के बास || ३ ||
भावार्थ : - जहाँ जनमानस के सुख-दुःख की चिंता से रहित होकर सुखों का उपभोग किया जाता हो,लोभ व् लालसा के कारण अभिलाषाऐं अधिकाधिक हों, जहाँ नित नव नवल वस्तु के प्रयोग की अभ्यस्तता हो, वहां दरिद्रता का निवास होता है ||

हठ धर्मिता पच्छ पात जहँ नित कलह क्लेस |
संपन ते संकटापन होत जात सो देस || ४ ||
भावार्थ : -- जहाँ हठधर्मिता हो, पक्षपातिता हो जहाँ नित्य कलह क्लेष हो वह संपन्न राष्ट्र संकटापन्न होता चला जाता है |

आसुरी सम्पद कर गहे होत जात जो पीन | 
रीतत सोधन सम्पदा करत देस कू दीन || ५ ||
भावार्थ : -- जो जनमानस अनुचित साधनों से धन-सम्पति अर्जित कर समृद्ध होता जाता है वह राष्ट्र की भू- सम्पदा को रिक्त कर उसे दरिद्र करता जाता है |

जो धन माँगे छाँड़ के अर्जन केर उपाए | 
सो तो मित  सुदामा सम  सदा दरिद कहलाए || ६ ||
भावार्थ : - जो राष्ट्र अथवा जो जनमानस धनार्जन की युक्तियों को न मांग कर धन की मांग करता है, वह मित्र  सुदामा के जैसे छटी का दरिद्र कहलाता है | 

पुरबल महु निज करगहे खेट खेह खलिहान | 
गेह गेह संपन रहे रहे देस धनवान || ७ ||
भावार्थ : -- प्राचीन भारत में इन्हीं गावों और खेत-खलिहानों से घर घर में विभूति विराजमान रहती थी और अपनी समृद्धि के लिए यह राष्ट्र विश्व भर में प्रसिद्ध था | 

सोइ देस खेटक खेड सोइ खेह खलिहान |
दीन दुखि धनहीन होत तरपत मरे किसान || ८ ||

भावार्थ : - अब वही देश है ,वही गाँव-खेड़े हैं खेत खलिहान भी वही हैं, किन्तु किसान की दशा दयनीय है वह तड़पते हुवे प्राण दे रहा है उसके गृह में दरिद्रता क्यों विराजित है इस प्रश्न का उत्तर हमें ढूंढ़ना ही होगा |


धनी के उतरु दान है निर्धन के धन-धाम | 
अधर्मी के उतरु धरम दूषन दंड बिधान || ९ || 
भावार्थ : - धनी यदि एक प्रश्न है तब दान उसका उत्तर है, निर्धन यदि एक प्रश्न है तब धन-सम्पति उसका उत्तर है, अधर्मी यदि एक प्रश्न है तब धर्म उसका उत्तर है, अपराध यदि एक प्रश्न है तब दंड विधान उसका उत्तर है |

अर्थात : - यदि कोई प्रश्न है तब उसका उत्तर भी अवश्य होगा.....

जहाँ दरिदर दान करत, समरथ करत त्याज |
दोषि सत कह करि नृप तप तहाँ धरम कर राज || १० || भावार्थ -- जहाँ दरिद्र दान करता हो, समर्थ त्याग करता हो, जहाँ अपराधी सत्य कहता हो और शासक तपस्या करता हो वहां धर्म का राज होता है |

अजहुँ त हमरे देस में दारिद भया दातार | 
समरथ लज्जा परिहरत मांगे हाथ पसार || ११ || 
भावार्थ : -- विद्यमान भारत में लोभ और लौलुपता के वश निर्लज होकर समर्थ उद्योगपति हाथ पसारे मत की मांग करता है और निर्धन दातार बनकर उस मत को दान करके स्वयं को धन्य मानता है | धिक्कार है ऐसे उद्योगपति पर.....

 







----- ॥ टिप्पणी ११ ॥ -----

>> इसी लिए गांधी को लोग पाखंडी कहते हैं, अनशनोपवास के ढोंग से सत्ता हथिया कर वह भारत को पूर्ण हिंसावादी राष्ट बनाना चाहते थे.....गांधी को  पाखण्ड  वाद  का  प्रणेता  भी  कहा  जाता  है.....   

>> राष्ट्र पति जी ! दीन दरिद्रों को जीत नहीं काम चाहिए ,रोटी चाहिए किन्तु आपके भवन की भव्यता उन्हें यह देने नहीं देती.....

>>  आली-ज़नाब ! आपके बदन की ये नेहरु कट अचकन ग़रीब-गुरबा को खुराके-ख़ुर्द से भी महरूम रखती है.....

>> " धर्म की उपस्थिति मनुष्य को मनुष्य के रूप में निरूपित करती है....."
   
व्याख्या : -  दया, तप, दान व् सत्य आदि साधारण धर्म  प्रत्येक मनुष्य में उपस्थित होना चाहिए यदि यह नहीं है तब वह पशु के तुल्य है.....

>> 'तरवे नमोस्तुते'   
(वृक्ष को नमस्कार हो ) 
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे | 
फलान्यपि परार्थाय वृक्षा : सत्पुरुषा इव || 

भावार्थ : - वृक्ष सज्जनों की भाँति स्वयं धूप में तपकर दूसरों के लिए छाया करते हैं, फलों को भी दूसरों को प्रदान कर देते हैं.....
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>> तोरि खाए फल होहि भल, तरु काटे अपराधु || 
भावार्थ : -- तुलसी दास जी कहते हैं फल तोड़कर खाना और जनमानस से यथोचित लाभ लेना उत्तम है पेड़ काटकर फल लेना और अनुचित कर लगाकर जनमानस को कष्ट देना हितकर नहीं है.....

>> मुसलमानों के आगमन से पूर्व यह देश भारत ही कहलाता था सिंधु नदी के तट पर बसने के कारण यह सिन्धुस्थान के नाम से भी प्रसिद्ध था | फिर मुसलमान आए ये 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे स्थान को स्तान कहते थे कालांतर में मुसलमानों ने अपने राज में इसे हिन्दुस्तान के नाम से सम्बोधित किया, इस शब्द युग्म का वास्तविक अर्थ है सिंधु नदी के तट पर बसने वाले लोगों का देश.....

>> लोकतंत्र में आपही भयऊ बहुतक दोस | 
अवर दोषु पुनि बोहि के गिरिहि चलत दुइ कोस || 
 भावार्थ : --  लोकतंत्र स्वयं दोषयुक्त है, अन्य जन संचालन तंत्रों के दोषों के भार को वहन कर यह अधिक दूर नहीं चल पाएगा | 



>>   अमलदार अमीरों की गरीबी नहीं जाती..,
      इस वास्ते हिन्द की बदनसीबी नहीं जाती.....

>> हम ऐसे शासन तंत्र द्वारा संचालित हो रहे हैं जहाँ क्रूरता और बर्बरता के लिए खुली छूट है और उसके प्रतिरोध के लिए दंड.....

>> एक डाकू भी अपने दल का नेतृत्व करता है.....,
एक महापुरुष ही सन्मार्ग प्रदर्शित करता हैं वह चाहे शासन में हो अथवा अनुशासन में.....

>> जनमानस के दास भए सेवा धर्म निभाउ |
भाउ रहते भाउ रहे अभाउ रहत अभाउ ||

भावार्थ : - भारतीय लोकतंत्र में मत को दान की श्रेणी में रखते हुवे जनप्रतिनिधि को जनमानस का सेवक कहा गया है | जो 


कोई प्रतिनिधि के रूप में जनमानस की सेवा करने की इच्छा रखता है वह सेवाधर्म का पालन करते हुवे उसके दुःख से दुःखी व् सुख से सुखी रहे | जहाँ ४०% से अधिक जनमानस निर्धन रेखा के नीचे जीवन यापन करता हो वहां उस प्रतिनिधि को निर्द्धंद्ध सुख उपभोग की अनुमति नहीं होनी चाहिए, अन्यथा जो अभी ४०% है उसे १०० % होने में देर नहीं लगेगी |

>> आतंकवाद से सामना करने में अपनी असफलता पर क्षतिपूर्ति का घूँघट करते ये नपुंसक सत्ताधारी प्राय: टी. वी, व् समाचार पत्रों के पीछे छुपे पाए जाते हैं.....

>> ये काम भारत की प्रभुता और अखण्डता अक्षुण्ण रखने की शपथ लेने वाले सत्ताधारियों का है |  सारे काम बुद्धिजीवी करेंगे तो ये क्या करेंगे.....?

>>विद्यमान समय की पत्रकारिता विश्वसनीय नहीं रही,  अब तो मीडिया से पत्रकारिता ढूंढनी पड़ती है, इससे प्राप्त तथ्य को जांच-परख कर ही अपना विचार व्यक्त करना चाहिए.....

>> जनमानस गधे के जैसे पैसा कमाए, फटे हुवे कच्छे बनयान में रहकर रूखी सुखी खाए और अपनी इस सारी कमाई को पंच परिधान पहनने, वायुयान में विराज विदेशों में, होटलों, भव्य भवनों, गुलछर्रे उड़ाने के लिए इन मंत्रियों के चरणों में अर्पित कर दे  तब तो वह साहूकार अन्यथा कर चोर.....क्यों.....?



>> यह कर व्यवस्था का नहीं यह नेताओं के निर्द्वंद्व सुख उपभोग का विरोध है जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के भी विरुद्ध है | यदि यह न हो तो जनमानस पर कर का भार अति न्यून हो सकता है.....

Tuesday, 11 July 2017

----- || दोहा-एकादश || -----

सब जगज जन भगवन कृत इहँ कन कन उपजोगि | 
जो कहँ ए केहि जोग नहि सो तो मानसि रोगि || ११ || 
भावार्थ : -- यह चराचर जगत ईशवर की कृति है यहां कण-कण उपयोगी है | जो यह कहता पाया जाए कि यह जीव अथवा अजीव किसी योग्य नहीं वह मानसिक रोगी है | उसके परिजनों को उसका उपचार करवाना चाहिए, यदि परिजन न हों तब सबंधित राष्ट्र उसके उपचार की व्यवस्था करे.....

राष्ट्र की समृद्धि व्यक्ति की समृद्धि सुनिश्चित करती है, व्यक्ति की समृद्धि राष्ट्र की समृद्धिसुनिश्चित करे यह आवश्यक नहीं..... 

साधारन असाधारन धन संपद कुल दोइ | 
असाधारन जनहित हुँत अखिल जगत कर होइ || १ || 
भावार्थ : - धन-संपदाएँ दो प्रकार की होती है एक साधारण  व् एक असाधारण  | असाधारण संपदाएँ व्यक्ति अथवा राष्ट्र की न होकर जनकल्याण हेतु समस्त विश्व की होती है | 


जैसे: -  ज्ञान  की  सम्पदा एक असाधारण है.....

तीनि भाँति कर होइहीं  साधारन भव भूति | 
एक निज दुज जन जन हेतु तीजी देस बिभूति || २ || 
भावार्थ : -- साधारण धन-संपदाएँ तीन प्रकार की होती हैं,  एक संपदा व्यक्ति के निजि उपयोग हेतु, एक सार्वजनिक उपयोग हेतु, एक राष्ट्र के उपयोग हेतु |

जन मानस की सम्पदा धरनि धेनु धन धाम | 
श्रम सील होत कमाइए करतब भल भल  काम || 3 || 

भावार्थ : -- राष्ट्र में भूमि- भवन, धान-धेनु, रुपया-पैसा, रत्न -मणि आदि सम्पदाएँ जन-मानस के निजि स्वामित्व हेतु होती हैं, जिसे वह उत्तमोत्तम कार्य करते श्रम पूर्वक अर्जित करे | वह ऐसा कार्य न करे जिससे जीवन के अधिकार का अतिक्रमण होता हो |

कूप बापि बन बाटिका घाट हाट बट सेतु | 
जाताजात के साधन सम संपद सब हेतु || ४ || 
भावार्थ : -- नलकूप, ताल-तालाब, वनवाटिका, नदियों के घाट, व्यापार मंडी, मार्ग, सेतु  एवं यातायात के साधन जैसी संपति, सार्वजनिक संपति होकर सर्वजन हेतु होती है |

नदी नदिपत बन परबत सकल खनिक खनि खान | 
राज कोष सम्पदा के  देस होत श्री मान || ५ || 
भावार्थ : - राष्ट्र की प्रभुसत्ता में सीमाबद्ध भूखंड के अंतर्गत स्थित भूमि, नदियाँ, समुद्र, खनित खनिज, समस्त खानें व् राजकोश आदि सम्पदा, राष्ट्र के स्वामित्व में होकर राष्ट्र की सम्पदा होती है | 

खेत जोत श्रम साध के निपजावे जो नाज | 
धनार्जन हेतु जै तौ सबते उत्तम काज || ६ || 
भावार्थ : -- श्रम की साधना करते हुवे खेत जोत कर अन्न का उत्पादन धनार्जन करने की सबसे उत्तम वृत्ति है | 


घर की संचित सम्पदा खोद खोद के खाए | 
दारिद होतब जात तब सो तो बिनहि कमाए || ७ || 

भावार्थ : -- वास्तविक उत्पादन में कठोर परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है | जब जनमानस कठोर परिश्रम न कर राष्ट्र की संचित व् संरक्षित सम्पदा को उत्खाद करते हुवे निजि सम्पति एकत्रित कर समृद्ध होता जाता है तब वास्तविक अर्जन के अभाव में वह राष्ट्र दरिद्र होता जाता है | 

एक सँजोइ सुकरम ते एक कुकरम ते सँजोइ | 
यह तो दैबिअ सम्पदा येह आसुरी होए || ८ || 
भावार्थ : -  वर्जित कृत्यों व् दुर्वृत्ति द्वारा अर्जित की गई धन-सम्पति आसुरी, तथा विहित कृत्यों व् सद्वृत्ति द्वारा अर्जित की गई धन -सम्पति, दैविक कहलाती है | 

धरनि धाम ते मानसा नीर नाज ते देस |
सरब जन की  सम्पति सों धनी होत परिवेस || ९ || 
भावार्थ : -- भूमि- भवन, धान-धेनु, रुपया-पैसा, रत्न -मणि   जन- मानस को व् जल, अन्न, उत्तम विचार, नदियों, खनिज आदि सम्पदा  देश को कूप, ताल-तालाब, वनवाटिका, sनदियों के घाट,  मार्ग, सेतु  जैसी सार्वजनिक संपति देश के परिवेश को समृद्ध करती हैं.....

राजा बासै झोपड़ा, चरन पादुका हीन | 
रचिया जो पथ राजसी, सो तो अर्थ बिहीन || १० || 
भावार्थ : --  जिस देश का राजा चरण- पादुका से रहित होकर  झोपड़ियों में निवास करता हो, वहां राजपथ जैसी सार्जनिक सम्पति  व्यर्थ होकर राजा की दरिद्रता का वर्धन करती हैं.....

रह जब संचित सम्पदा तब सम्पत सब काल | 
सीस पड़े को आपदा, जन जन होत निहाल || ११ ||  
भावार्थ : -- जिस राष्ट्र में संयत व्यवहार से सम्पदाएँ संचित रहती हैं उस राष्ट्र के भूत भविष्य और वर्तमान तीनों काल सुखमय होते है, वहां आने वाली पीडियां जन्मजात धनी होती हैं | आपदा ग्रस्त होने पर भी वहां कुछ अभाव नहीं होता.....

उद्यम मन ते धन लख्मी आलस मन ते हानि || 
माया के बंधन पड़े तामें ऐंचा तानि || 
----- || संत कबीर दास || ----
भावार्थ :- उद्यमशीलता लाभ जनित लक्ष्मी की जननी है  | आलस्य दरिद्रता का जनक है |  जनमानस जब विलासिता के बंधन में पड़ता है यब वह अपनी मातृ भूमि की खाल खाने पर भी उतारू हो जाता है ||