Sunday, 31 July 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५४ ।। -----

रविवार, ३१ जुलाई, २०१६                                                                                                 


तुम त्रिकाल दरसी रघुनाथा । बिस्व बदर जिमि तुहरे हाथा ॥ 
लोगहि चरन सरन जिअ जाना  । बोधिहौ मोहि सोइ बखाना ॥ 
हे रघुनाथ ! आप तो त्रिकाल दर्शी हो,यह चराचर विश्व आपके करतल पर रखे बद्रिका के समान है । लोकाचार के आश्रय आपने मुझसे ज्ञातित प्रसंग पूछा । 

तथापि प्रभो सबहि दिन जैसे । कहिहउ जसि करिहउँ मैं तैसे ॥ 
सिरोमनि तुम सबहि के राई । कहौं  बृतांत  सुनहु गोसाईं ।॥ 
तथापि प्रभु में सदैव की भांति आपकी आज्ञा का अनुशरण करूंगा ॥  आप सभी राजाओं के शिरोमणि हो  अत: हे स्वामिन  ! जो आपने पूछा मैं वह वृत्तांत कहता हूँ सुनिये  : -- 

सिरु पतिया सोहत अति भारी । प्रभो तुरग सो कृपा तिहारी ॥ 
पथ पथ पुर पुर पौरहि पौरे । बिरमन बिनहि भूमि बन भौंरे ॥ 
 प्रभो ! आपका कृपापात्र होकर भालपत्र के कारण शोभा को प्राप्त वह अश्व रहित पंथ-पंथ, नगर-नगर, द्वार-द्वार भूमि-भूमि, वन-वन  में व्यवधान से रहित होकर विचरता रहा ॥   

दिनकर कुल अस तेज प्रचंडा । निज बल केहि न होइ घमंडा ॥ 
पुरबल हय को गहिब न पारा । जो बल गरब गहिब सो हारा ॥ 
दिनकर वंश का पराक्रम ऐसा प्रचण्ड है कि उसके सम्मुख किसी भी राजा को अपने बल पर दर्प नहीं हुवा  । पहले तो किसी ने उस अश्व का हरण नहीं किया, जिसने किया वह परास्त हो गया ॥ 

प्रभो श्री चरनन सिरु नत सब नृप सहित समाज । 
जोग जुग पानि आनि लिए अरपिहि निज निज राज ॥ 
पुरजन परिजन पुत्र-पौत्र सहित वह नृप  प्रभु के श्री चरणों में अपना -अपना राज्य समर्पित कर विनय पूर्वक नतमस्तक हुवे ॥ 


गह सकै हय जोइ अवनीसा । अहहिं कहु त को असि बिजिगीसा ॥ 
जोइ दनुजपत दसमुख हंता । जानत  ए सोए जाकर कंता ॥ 
कहिए तो पृथ्वी पर ऐसा कोई राजा है, जो विजय की अभिलाषा से इस अश्व का हरण कर सके ?  यह संज्ञान करते हुवे कि जो दानवपति दशानन के विनाशक हैं वह इसके स्वामी हैं | 

प्रभो मनोरम तुरगम तोरे । पहुँचिहि अहिच्छत्रा पुर पौरे ॥ 
रुर रुचिर अति रमनीअ देसू । बीर सुमद तहँ बसैं नरेसू ॥ 
प्रभु ! आपका यह मनोहर तुरंग सर्वत्र विचरण करता हुवा अहिच्छत्रा  के द्वार पर पहुंचा | यह देश अत्यंत रमणीय, सुन्दर व् शोभावान था |  राजा सुमद वहां के वासी थे और वीर भी थे | 

सुनि सो प्रबसि अस्व एकु नीके । अहहि अवध पति रघुबर जी के ॥ 
कह सँवारन नगर निकेता । बहुरि सहित सुत सैन समेता ॥ 
उन्होंने जब सुना एक सुन्दर अश्व ने राज्य में प्रवेश किया है जो अयोध्यापति श्री रघुनाथ जी का है तब नगर और घरों को सुसज्जित  करने का आदेश दे कर वह स्वयं सेना को साथ लिए पुत्रों सहित :-- 

गए रिपुहन पहिं प्रभु पद सेबा ।  सबहि सम्पत समरपत देबा ॥ 
बड़ बड़ पत जा सहुँ नत होई । प्रनत तव पद सुमद प्रभु सोई ॥ 
शत्रुध्न के पास गए अपना अकंटक राज्य आपके चरणों  की  सेवा में   समर्पित कर दिया | ये हैं राजा सुमद जो बड़े-बड़े राज-प्रभुओं के द्वारा सेवित आपके चरणों को प्रणाम करते हैं | 

तव दरसन उर लाह लिए आयउ पाए पयाद । 
अजहुँ  डिठी निपात ताहि देवौ कृपा प्रसाद ॥    
ह्रदय में आपके दर्शन की अभिलाषा किए यह चलकर आए हैं | इनपर दृष्टिनिपात कर अपने कृपा प्रसाद से इन्हें अनुग्रहित कीजिए  |  

सोमवार, १ अगस्त, २०१६                                                                                                          

करिअ रवन गयउ जब आगे । निद्रालस बस रजस कन जागे ॥ 
धावत गयउ नगर ते दूरे । घेर गिरिबन गगन भरपूरे ॥ 
वह  अश्व जब रव करता आगे बढ़ा त्वनिरावपन्थ में निद्रा के वशीभूत धूलि  के कण जाग उठे |  वह अश्व द्रुत गति से दौड़ता हुवा नगर की दृष्टि से ओझल हो गया, धूलि कण पर्वत एवं वनों को घेरकर गगन में व्याप्त हो गए | 

बहुरि सुबाहु नगर पगु धारा । जोहि जोइ बल सबहि प्रकारा ॥ 
तेहि के सुत दवन सुभ नामा । गहए ताहि त भयउ संग्रामा ॥ 
तदनन्तर उसने उस सुबाहु की नगरी में प्रवेश किया जो सभी प्रकार के बल से संपन्न था  | सुबाहु के पुत्र का शुभ नाम दवन था | उसने उस श्रेष्ठ अश्व को पकड़ लिया िर तो युद्ध छिड़ गया | 

जूझत मुरुछा गहि महि परयो । पुष्कल बिजै कलस कर धरयो ॥ 
तब महतिमह राउ सुबाहू । आयउ खेत भरे उर दाहू ॥ 
युद्ध करते हुवे वह मूर्छित हो कर धराशायी हो गया विजय कलश पुष्कल के हाथ की शोभा बना | तब  ह्रदय में विद्रोह की ज्वाला भरे महातिमह राजा सुबाहु का  रणक्षेत्र में आगमन हुवा  | 

चले समुह गरजत हनुमंता । भिरिहि तासु सो नृपु बलवंता ॥ 
ताकर ग्यानु श्राप बिलोपा । रहे न सुधि किछु उर भर कोपा ॥ 
वीर हनुमान गरजते हुवे उनका सामना किया बलवान राजा उनसे भीड़ गया | उनका ज्ञान श्राप से विलुप्त हो गया था ह्रदय में क्रोध भरा था इस हेतु उनका चित्त चेतना से रहित था |  

द्युति गति गत अति बलवत मारि चरन हनुमान । 
लगे श्राप दुराए गयो बहुरिहि गयउ ग्यान ॥  
विद्युत् की गति सी शीघ्रता का प्रदर्शन कर हनुमंत ने उनपर अपने चरण से बलपूर्वक प्रहार किया, इस प्रहार से उनका श्राप दूर हो गया और गया हुवा ज्ञान लौट आया |

मंगलवार, ०२ अगस्त, २०१६                                                                                            

पुनि सो महिपत प्रभु कर सेबा । सौंपि चरन निज सरबस देबा ॥ 
समर कला सब बिधि कुसलाया । प्रनमत बिनय बत जोइ राया ॥ 
तब उस राजा ने प्रभु के सेवार्थ आप श्री के चरणों में अपना सर्वस्व सौंप दिया | समर कला में सभी प्रकार से निपुण जो विनय पूर्वक आपको प्रणाम कर रहे हैं, 

जाकर गाँठिल तुंग सरीरा । अहहि सुबाहु सोइ रनधीरा ॥ 
दया डिठी करि प्रभो निहारी । किजो तापर स्नेहिल बारी ॥ 
जिनकी देह हष्ट-पुष्ट व् अंग-अंग सौष्ठव को प्राप्त हैं यह  रणधीर यह राजा सुबाहु हैं | हे प्रभु ! आप दया दृष्टि से इनका विलोकन कर इनपर स्नेह की वर्षा कीजिए | 

तदनंतर मेधीअ तुरंगा । चोख चरत इब भयउ पतंगा ॥ 
आयउ देउ नगर संकासा । सुहा गहि अति बसिहि केलासा ॥ 
तदननतर वह यज्ञ सम्बन्धी अश्व तीव्र गति से गमन करते हुवे गगनचर होकर हवा से बातें करते देवनगरी के निकट पहुंचा | भगवान शिव जी के   निवासित होने के कारण वह नगरी अत्यंत सुशोभित हो रही थी | 

तहँ घटे सो बिदित सबु काथा । आए इहाँ आपहि रघुनाथा ॥ 
मिलिहि बहुरि बधि बिद्युन्माली । सत्यवान नृपु बहु बलसाली ॥ 
स्वयं आपके पदार्पण से हे रघुनाथ ! वहां जो कुछ घटित हुवा वह सब कथा आपको विदित है | तत्पश्चात विद्युन्माली दैत्य का वध किया गया फिर अति बलशील राजा सत्यवान से मिले |   

आगिल कल कुंडल नगर चपरित चरण धराए ॥ 
भए समर सुरथ संग सो सब प्रभु तोहि जनाए ॥
आगे जाने पर अश्व के आतुर चरणों ने  कुण्डल नामक शोभनीय नगर में पधारे | प्रभो! वहां भी जो कुछ घटित हुवा वह सब आपको ज्ञात है |  

बुधवार, ०३ अगस्त, २०१६                                                                                             

बहुरि कुंडल नगर ते छूटा । बिचरत चहुँ दिसि बिनहि अगूँटा ॥ 
अजहुँ गहिब न केहि बरबंडा । निज बल करिअ न कोउ घमंडा ॥ 
कुण्डल नगर से निकलकर वह अश्व चारों दिशाओं में निर्बाध स्वरूप में विचरण करने लगा  अपनी बलशीलता पर फिर किसी ने घमंड नहीं किया और किसी वीर ने उसका हरण नहीं किया | 

भँमरत चपल चरन जबु फेरे । तेहि औसर सघन बन घेरे ॥ 
पहुंचसि प्रभु तव तुरग मनोरम । बाल्मीकि केर नीक आश्रम । 
पृथ्वी का चपलता पूर्वक  भ्रमण करते हुवे  आपका वह मनोहर तुरंग लौटते समय घने वनों से घिरे वाल्मीकि जी के रमणीय आश्रम में पहुंचा | 

गयउ माझ जूं बिटप समूहा । सुनहु तहँ जौ भयउ कौतूहा ॥ 
बीर बलो एकु बालकु आयउ । सोडस बरस बयस कुल पायउ ॥ 
और जैसे ही वह विटप समूह के मध्य भाग गया तबवहाँ जो कौतुहल हुवा उसे सुनिए | कुल षोडश वर्ष की अवस्था को प्राप्त वहां एक वीर बालक का आगमन हुवा | 

जति पटतर पट कर धनु धारा । रूप बरन रघुबर अनुहारा ॥ 
भाल बँधेउ पतिया पेख्यो । लिआ गहि पढ़ बतिया देख्यो ॥ 
उसका रूप-वर्ण आप श्री रघुनाथ का अनुशरण कर रहा था | जब उसने  अश्व के भाल पर आबद्ध पत्रिका का अवलोकन किया तब उसे हस्त-गत कर उसपर लेखबद्ध किये हुवे वक्तव्य को पढ़ा |  

घनक घटा गहराए जिमि भोर लखइ नहि भोर । 
सैन पाल काल जित असि करियो रन घन घोर ॥ 
गर्जती हुई घटाओं के गहरे हो जाने से जैसे भोर भोर रूप में परिलक्षित नहीं होती, उसने सैन्यपाल कालजित के साथ वैसा ही घनघोर संग्राम किया | 

बृहस्पतिवार, ०४ अगस्त, २०१६                                                                               

गह सो बीर तरल तलवारा । करा प्रहार धरातल पारा । 
बहुरि कला कृत एक ते ऐका । मारिब पुष्कल सहित अनेका ॥ 
उस वीर ने तीव्र धार से युक्त धारासार धारण कर  प्रहार करते हुवे उसे धराशायी कर दिया |  तत्पश्चात एक सी एक युद्ध कलाऐं करते हुवे अनेकानेक सैनिकों सहित पुष्कल को मार गिराया | 

रिपुदवनहु जबु ता सहुँ गयऊ । मर्माहत कृत मुरुछा दयऊ ॥ 
लह हरिदै दुःख दारुन दाहू । फरकेउ नयन अरु दुहु बाहू ॥ 
भ्राता   शत्रुध्न भी जब उसके  सम्मुख गए तब उसने मर्म पर आघात कर उन्हें भी मूर्छित कर दिया |  ( मूर्छा विगत होने पर )  ह्रदय में दारुण पीड़ा की दहन का अनुभव करके उनके नेत्र और दोनों भुजाएं फड़कने लगी | 

कोपहि असि जसि कोपि न काहू । दिए अघात करि मुरुछित ताहू ॥ 
होइ बीर सो हत चित जोंही । प्रगसि अबरु एकु बालक तोही ॥ 
फिर उन्होंने अब तक नहीं किया था ऐसा कोप किया, और आघात करते हुवे उस बालक को भी मूर्छित कर दिया | जैसे ही वह वीर हतचित्त हुवा वैसे ही वहां एक दूसरा बालक प्रगट हो गया | 

दरसन माहि दोउ एक रूपा । धनु कर जटा धर जति न भूपा ॥ 
दोउ एकहि एक होइँ सहाई । बहुरि जुगत दुहु करिब लड़ाई ॥ 
दिखने में उनका रूप एक जैसा था हस्तगत धनुष शिरोपर जटा न वह साधू थे न ही  क्षत्रिय थे | जब दोनों को  एक दूसरे का सहारा प्राप्त हुवा, तब फिर वह एकीभूत होकर संग्राम करने लगे |  

हय हस्ति बट अँट भट मरकट भरी चतुरंगनि सैन बिभो । 
फेरि बदन धुजा पट मुख धरी लटपट भय भर नैन बिभो ॥ 
उपटन चरन अह !घूँघट करी निरखिहि ऐंचा तैन बिभो ॥ 
धाई थरथरी कटि घट कर पिछु पछियावैं बैन बिभो । 

विभो !  हाथी घोड़ों से बटी एवं सैन्यदलों से अटी वानरों से भरीपूरी आपकी चतुरंगिणी सेना ध्वजा पट को अधरों में धारण किए भयार्त नेत्रों से मुख-मंडल  फेर कर चरणों में आघात के चिन्ह  लिए घुंघट किए हुवे उन बालकों पर तिर्यक दृष्टि का आक्षेप करती  कटती घटती थरथराती पीठ दिखाती भाग खड़ी हुई बालकों के बाण उसका पीछा कर रहे थे |  

किरीट कवच कल कुंडल मौलि मुकुट मनिहारी । 
सब सिंगार निहार सो हरि हर लियो उतारि । 
तत्पश्चात श्रृंगार पर दृष्टिपात कर उन बालकों ने  कंकण, कवच, सुन्दर कुण्डल, मनोहारी मौलिमुकुट आदि प्रसाधनों को उतारकर हरण कर लिया |

कर कोदंड कलित करे बले बलइ बल हार । 
अह सर्या कर धार सो, लेइ गयो चिन्हारि ॥ प्रभो 
प्रभो ! कोदंड को कलित करते हुवे हस्त बलि हारते उस चतुरंगिणी ने जो वलय (मुद्रिका ) वलयित की थी अहो !  उन उँगलियों (बाण)  को अपने हस्त में ग्रहण कर वह बालक उसे चिन्ह स्वरूप में ले गए |

वलय = दो दो पंक्तियों की सैनिक श्रेणी, मुद्रिका 
बल हार =  बलहार, बल का हार 
कोदंड = धनुष, भृकुटि 
शर्या = उंगली, बाण 

शुक्रवार, ०५ अगस्त, २०१६                                                                                           



बाँध्यो गहिब दुहु कपि कंता । एकु सुग्रीव एकु हनुमंता ॥ 
कसियो बलइ रसरि कर जोरी । परन कुटिर लय गयो बहोरी ॥ 
तदनन्तर उन्होंने सुग्रीव तथा महावीर हनुमान इन दोनों कपि नाथों को बाँधते हुवे इनके दोनों हाथों को रसरी से बलपूर्वक कसते हुवे अपनी पर्ण-कुटिया में ले गए | 

तदनंतर कृपाकर आपही । मेधीअ तुरग देइ बहुरही ॥ 
मरनासन पुनि सैन जियावा । अह साँसत जिअ महु जिअ आवा ॥ 
तत्पश्चात हमपर कृपाकरते हुवे स्वमेव यज्ञ सम्बन्धी तुरंग को लौटा दिया,  और मरणासन्न सैनिकों को जब जीवन-दान दिया संकटापन्न सेना ने तब चैन की सांस ली | 

लेइ गहिब सो हय सिरु नाईं । आए सरन त्रिभुवन गोसाईं ॥ 
ऐतकहि प्रभो मोहि जनाया । जिन्हनि प्रगसित सहुँ कहि पाया ॥ 
हे त्रिभुवनके स्वामी ! अश्व लेकर अब हम लोग आपकी शरण में आ गए |  जितना घटना-क्रम मुझे ज्ञात है वह मैने आपके सम्मुख प्रकट कर दिया |   

कहत अहिपत सुनहु बिद्बाना । घटना बलि जस सुमति बखाना ॥ 
बाल्मीकि कर आश्रमु नीके । बसएँ सुत जहँ जानकी जी के ॥ 
शेष जी कहते हैं : -- 'हे विद्वान मुनि सुनो ! जहाँ जानकीजी के पुत्र  निवास करते थे महर्षि वाल्मीकि के मनोरम उस आश्रम की वार्ता काटे हुवे सुमति ने जिस घटनावली का वर्णन किया | 

कवन सो बीर प्रभु अनुमानिहि । जानपनी सब जान न जानिहि ॥ 
राघव मंदिर महमखु होई । दीन्ही चरन मुनि सब कोई ॥ 
उससे प्रभु को यह ज्ञात हो गया कि वह वीर कौन हैं | वह उनके ही पुत्रहीन हैं यह जान बुझ कर भी वह अज्ञानी बने रहे | राघव के मंदिर  में  महायज्ञ का आयोजन  हो रहा है सभी मुनिगण का वहां पधारे हुवे हैं | 

तहँ सहुँ आनि पधारिहि बाल्मीकि मुनि राए । 
सब बिधान अनुमान के, तासों पूछ बुझाए ॥  
उनके साथ मुनिराज वाल्मीकि का भी आगमन हुवा  तब सभी प्रकार से विचार करते हुवे प्रभुने उनसे प्रश्न किया | 

रविवार, ०७ अगस्त, २०१६                                                                                   

मुनि तुहरे कुटि मम सम रूपा । कवन जमलज जौ जति न भूपा ॥ 
धनुर बिधा महुँ परम प्रबेका । समर कला कृति एक ते ऐका ॥ 
मुने ! 'आपकी कुटिया में मेरे समरूप युगल किशोर कौन हैं जो न यति हैं और न ही क्षत्रिय हैं | सुमति के कथनानुसार जो धनुर्विद्या में अत्यंत प्रवीण हैं जिन्होंने युद्ध की एक से बढ़कर एक कलाओं का प्रदर्शन किया |'

सचिउ सुमति मुख बरनै जैसे । होइ कहहु को चकित न कैसे ॥ 
किए मुरुछित रिपुहन समुहाई । हति खेत खेलाइ खेलाई ॥ 
सचिव सुमति ने जिस प्रकार से वर्णन किया कहिए तो फिर कोई चकित कैसे न हो ?  शत्रुध्न के सामना करने पर भरी रणभूमि में उन्होंने उसे   घायल करते हुवे खेल ही खेल में मूर्छित कर दिया | 

बाँधि लियो हँसि हँसि हनुमंता । छाँड़ दियो कसि तुरग तुरंता ॥ 
कौतुक उपजिहि मन किन काहू । बालकन्हि सब चरित सुनाहू ॥ 
महा बलशाली हनुमंत को  सरलता पूर्वक बाँध लिया तथा बांधे हुवे अश्व को  तत्काल मुक्त भी कर दिया | चित्त में कौतुक की उत्पत्ति फिर क्यों न हो | मुनिवर अब आप उन बालकों के चरित्र का परिचय दीजिए | 

बाल्मीकि मुनि कहए स्वामी । नराधिपत तुम अन्तर्यामी ॥ 
तुम निधान ग्यान गुन सीला । जानिहु प्रभो सबहि नरलीला ॥ 
तत्पश्चात वाल्मीकि मन ने कहा : -- हे नाथ ! आप ज्ञान गुण व् शील के निधान हैं प्रभो !  मनुष्यों की सभी लीलाएं आपको ज्ञात हैं |  

पूछेउ मोहि कहौं सो तुहरे मन परितोष । 
गहौ चरन कर दिजो छम जान कतहुँ मम दोष ॥ 
तथापि आपने कौतुकवश मुझसे प्रश्न किया है आपके मन की संतुष्टि के लिए उत्तर देता हूँ यदि मेरा कोई दोष परिलक्षित हो तब मैं चरण पकड़ कर आपसे प्रार्थना करता हूँ आप मुझे  क्षमा प्रदान कीजिएगा |  

सोमवार, ०८ अगस्त ,२०१६                                                                                        

जौ बेला तुम जनक किसोरी । प्रान समा सिय हियप्रिय तोरी ॥ 
दोषु बिनहि परिहर बन देहू । आनि न कबहु न केहि सपनेहू ॥ 
जिस समय आपने  ह्रदय को अत्यंत प्रिय अपनी धर्मपत्नी जनक किसोरी सीता को निर्दोष होने के पश्चात भी त्याग कर ऐसा वन वास दिया था जो कभी किसी ने स्वप्न में भी विचार नहीं किया | 

मन क्रम बच प्रभु पद अनुरागी । देहु गरभिनि सम्पद त्यागी ॥ 
बेहड़पन अत बनहि ब्यापा । बिहरत बिहरन करिहि बिलापा ॥ 
मन, कर्म और वचन से आपश्री के चरणों की अनुरागी आपके द्वारा त्यागी गई वह गर्भवती लक्ष्मी निबिड़तम वन में भटकती हुई आपके वियोग से दुखित होकर विलाप कर रही थी | 

ब्याल कराल बिहग बन घोरा । जग लग रयन बिलग न भोरा ॥ 
कातर कंठ करुना अस भारी । उपटन चरन चरिहि सुकुआँरी ॥ 
हिंसक जंतुओं एवं विकराल पक्षियों से सघनता से युक्त उस वन में ऐसा प्रतीत होता मानो  संसार में रात्रि  से प्रभात पृथक न होकर परस्पर एक हैं |  कातर कंठ में अत्यंत ही करुणा भरे घायल चरणों से वह सुकुमारी ऐसे वन में विचरण कर रही थी | 

पग बिनु डग मग रिपु बहु जाती । दहइ दारुन कुररि की भाँती ॥ 
दुःख आतुर अह बिलखति रोती । मुकुता गह मुख मुकुत पिरोती ॥ 
परिचालन से रहित वनमार्ग में चलने के कारण विविध प्रकार के कंटक उनके चरणों में समाहित होकर कठोर कुररी के जैसे पीड़ा दे रहे थे | आह ! दुःख से व्याकुल होकर रोती बिलखती सीप स्वरूप मुख में मुक्ता स्वरूप अश्रुबिंदुओं को पिरोती हुई : - 

दुखिया जनि गोसाईंया, निरखत बन मेँ ताहि । 
पुनि सादर निज परन कुटि लेइ गयो सँग माहि ॥ 
उस दुःखिनी को मैने जब उस वन में देखा हे स्वामी ! तब आदर सहित उसे मैं अपने साथ अपनी पर्ण-कुटिया में ले गया | 

मुनि बालक करनक चुगि ल्याए । करीर नठि सुठि कुटीरु बनाए ॥ 
तहँ दुहु जम कुल दीप जनावा । दीपित द्योति दहुँ दिसि छावा ॥ 
मुनियों के बालक पेड़ की पत्तियां, टहनी आदि संकलित कर लाए  तत्पश्चात उन्हें बांस संगठित करते हुवे एक सुन्दर कुटिया बना दी, वहां सीता ने  दोनों कुल दीपकों के जोड़े को जन्म दिया जो अपनी कांति से दसों दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे | 

एक कर नाउ कुस मैं राखेउँ । दूज लाल लव कहि भाखेउँ ॥ 
उजरै बिधु जिमि उजरै पाँखा । जुगल तनुज तिमि बढ़तै लाखा ॥ 
पहले बालक का नाम मैने कुश रखा तथा दूसरे लाल को लव कहकर सम्बोधित किया |  शुक्ल पक्ष में जिसप्रकार चन्द्रमा निरंतर वृद्धि को प्राप्त करता है उसी प्रकार ये दोनों जुटे कुमार भी वृद्धि को प्राप्त होते चले गए | 

चारिउं बेद सहित छहुँ अंगा । भयउ कुमार पढ़िय सब संगा ॥ 
दै बिद्या सब दिया जनेऊ । होए कुसल मुनि बालक तेऊ ॥ 
तदनन्तर इन दोनों बालकों ने अन्य मुनि बालकों के साथ छहों अंगो सहित चारों वेदों का अध्ययन किया | समस्त विद्या प्रदान कर यज्ञोपवीत संस्कार करते हुवे मैने इनका जनेऊ किया, प्रभु ! इन बालकों ने अन्य बालकों से अधिक प्रावीण्यता अर्जित की थी |  

आजुरबेद कि आयुध बेदा । सकल सास्त्र सहित सब भेदा ॥ 
करियउँ जगत निपुन रघुनाथा । बहोरि धरा माथ पर हाथा ॥ 
हे रघुनाथ ! यजुर्वेद हो कि आयुर्वेद हो रहस्यों सहित शस्त्र एवं समस्त शास्त्रों में इन्हें जब सर्वाधिक निपुण कर दिया तब इनके मस्तक पर हाथ रखते हुवे गुरुमंत्र देकर इनकी दीक्षा संपन्न की | 

षडज ते निषाद लग जब , सुर सरगम  कर जोग । 
मधुर मधुर गावहिं तब चितबहि चितबत  लोग ॥ 

षडज, मध्यम,गांधार से लेकर निषाद तक सभी सप्त स्वरों की संगती करके मधुरिम -मधुरिम गान करते तब इन्हें देखकर सभी लोग स्तब्ध हो जाते | 
बुधवार, १० अगस्त, २०१६                                                                                    


सत सुर माल कण्ठ कर बीना । करिहि सांगत त भयउ प्रबीना ॥ 
पूर पनब जब बजएँ मृदंगा । रंजनए छहुँ राग सहुँ रंगा ॥ 
कंठ में सप्त स्वर मालिका एवं हस्त में वीणा के संगत से  इन्हें संगीत में भी प्रावीण्यता प्राप्त हुई | पणब  पूर्णित मृदंग का वादन होता तब गायन और वादन के साथ छहों राग अनुरक्त हो जाते | 

जुगल केरि अस कौसल देखा । होहि मोहि पभु हरख बिसेखा ॥ 
परम् मनोहर श्री रामायन । तासु नितप्रति करैं सो गायन ॥ 
दोनों कुमारों का कौशल्य देखकर जब सब विस्मित रह जाते प्रभु! तब मुझे विशेष हर्ष होता और में इनसे परम मनोहर रामायण-काव्य का गान कराया करता | 

जानत ए के होवनिहारा । पूरबल जिन्ह रचि मैं पारा ॥ 
मधुप निकर जस मधुबन झौरहिं । करत गान तिमि बन बन भौरहि ॥ 
भवितव्य का ज्ञान होने के कारण पूर्व में ही मैने जिसकी रचना कर दी थी |  जिस प्रकार मधुवन में भौंरों के समूह गुंजन करते फिरते हैं उसी प्रकार ये दोनों बालक भी इस रचना का गान करते वन-वन फिरा करते |  

कुसुम कली कुसुमित अति सौंहे। खंजन सहित मृगहु मन मौहें ॥ 
गावत लय गति अति मधुराई । श्रोतस श्रुत श्रुत श्रुति सुख पाई ॥ 
उनके गायन से पक्षी एवं मृग  भी सम्मोहित हो जाते कुसुम की कलियाँ पुष्पित होकर वन को सुशोभित कर देती  लय में विलीन होने पर जब उनका गायन अत्यंत ही मधुर हो जाता तब श्रोतागण इसे सुन- सुन कर परम आनंद की अनुभूति करते || 

श्रुति सो गायन  श्रुति सुख पावन बारि पति पुनि एक दिवा । 
गहेउ हाथ निज साथ पुनि बिभावरि पुरी गयउ लिवा ॥ 
जुगल मुकुल मंजुल मनोहर सुर सागर करि पार गए । 
पावन पबित तव मृदुल चरित गावनि देउ आयसु दए ॥ 
उस मधुरिम गायन को सुनकर अपने कर्ण को तृप्त करने के लिए फिर एक दिन वारि नाथ वरुण उन बालकों का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने साथ विभावरी पूरी ले गए, वहां उन्होंने जब  आपके  पावन पवित्र मृदुल चरित्र का गायन करने की आज्ञा दी तब वह मंजुल व् मनोहर युगल किशोर उसका गान करते हुवे स्वरों के सागर को पार कर गए | 

जनमत भगवन लगन परि बादिहि बादल बृन्दु । 
नाथ नयन  लह चहँ गगन सिय मुख पूरन इंदु ||  
जन्म  के पश्चात जब आप श्री भगवान  का शुभलग्न हुवा तब वारि वृन्द वाद्य वृन्दों के जैसे वादन कर रहे थे |  उस समय रघु नाथ के श्री नयन गगन के सदृश  तथा माता सीता का श्री मुख पुर्णेन्दु होने को उत्सुक थे | 

बृहस्पतिवार, ११ अगस्त, २०१६                                                                               
बादिहि बादल बृन्दु अगासा । झरिहि झर झर बिंदु चहुँ पासा ॥ 
भर भर कलसि करषि कर देईं । पियत पयस बूझै न पिपासा ॥ 
आकाश में वारि वृन्द के वादन से जल बिंदु भी नीचे गिरते हुवे झरझर की झनकार से निह्नादित हो उठे  | इस संगीत रस को कलशों में भर भर कर वह श्रोताओं को मनुहार पूर्वक प्रदान करते, भरपूर रसपान के पश्चात भी उनकी मधुरता से कोई भी तृप्त नहीं होता |  

दरसै छटा पुरुट पट डारे । अरुन प्रभाकर करिहि बिलासा ॥ 
कोमल करज जलज जय माला । पहिरावत मुख लवन ललासा ॥ 
मेघ- ज्योति को सुनहरे पट का घूंघट करते देखकर सांध्य काल का सूर्य जैसे विलास कर रहा था | कोमल हस्तांगुलियों में स्थित जलज की जयमाला को  माता सीता द्वारा भगवान के कंठगत करते हुवे उनके मुख पर लावण्य क्रीड़ा करने लगा |  

गिरि गहबरु अरु फिरैं पयादे । कुपित जनि जब दियो बनबासा ॥ 
हरिअ हरानत हरि अरि हरियो । ल्याए हरि हरि करिअ बिनासा ॥ 
कोप के अग्नि कुंड में स्नान जब प्रभु को जब माता कैकेई ने वनवास दिया तब वह पैरों से चलते दुर्गम  गिरि अरण्यों में भटकते फिरे | वहां जब रावण ने चौर्यकरण द्वारा आप हरि की श्री का हरण कर लिया तब शनै: शनै:  दानवों का सर्वनाश करके आप उन्हें ले आए | 

बिमनस मुख सो रभस दुरायो । सरस रहस बस बरुन निवासा ॥ 
कंठ ताल नूपुर दल पूरे  । गावहि झनक झनक चौमासा ।  
सीता के सीता के लौटने का प्रसंग श्रवण कर सरसता के वशीभूत वरुण के निवास में श्रोतागणों के वैमनस्य मुखों से शोक दूर हो गया था | कंठ व् तालव्य में नूपुर दलों को पिरो कर फिर तो जैसे वर्षा ऋतू भी उन बालकों के संगत झनक झनक करते हुवे गायन करने लगी | 

अबरु अबरु अरु गीति ग्याता । हितु हिती गन सहित हे ताता ॥ 
श्रुत बरुनप निज परिजन साथा । राजस रहस सरस सो गाथा ॥ 

अस तो सरस् पयस बहु होईं । तोर चरित ते अधिक न कोई ॥ 
सकल श्रोतस श्रवनतहि जाइहिं । चरित पयस नहि पियत अघाईं ॥  
ऐसे तो  रसमय अमृत अतिसय हैं किन्तु आपके चरित्र से अधिक पावन कोई सुधा  नहीं है यह सुधा से भी अधिक सरस है  | सभी श्रोतागण इसे श्रवण करते ही चले गए किन्तु इस अमृतमय चरित्र का रसपान  से  उनकी पिपाशा शांत नहीं होती | 

बरुन लोक मैं गयउँ बहोरी । करे अगवान दुहु कर जोरी ॥ 
द्रवीभूत मम बंदन करियो । पेम भाव हिय पूर न परयो ॥ 
मै भी उत्तम वरुण लोक में गया वहां वरुण ने हाथ जोड़कर मेरा अभिनन्दन किया एवं द्रवीभूत होते हुवे  मेरी पूजा एवं वंदना की |  उस समय  उनका  प्रेमभाव इतना अत्यधिक था की वह से मेरे छोटे से ह्रदय में नहीं समाया  |

रागिन रंग बयस गुन सोंही । बरुन जुगल पर प्रमुदित होंही ॥ 
सुनि रघुकुल मनि तजहि सगर्भा । कहिहि एहि बिधि सिया संदर्भा ॥ 
वह उन युगल बालकों के गायन व् वादन की विद्या तथा उनकी अवस्था एवं  गुणों से अत्यधिक प्रसन्न थे | जब उन्होंने सुना कि रघुकुल के शिरोमणि ने सीता को सगर्भ त्याग  दिया है तब उन्होंने ने उनके सन्दर्भ में यह निवेदन किया : -- 

सिय सम जग को सती न होई । अहहि अस पति बरता न कोई ॥ 
होहि सो गुन संपन्न कैसे । जोहि महि ससि सम्पदा जैसे ॥ 
सीता के समान जगत में न तो कोई सती है और न ही कोई ऐसी पतिव्रता है वह तो सभी गुणों से ऐसे संपन्न है जैसे पृथ्वी धन-धान्य की सम्पदा के  सन्निधान से संपन्न होती है | 

सील बिरधा रूपवती रघुबर देइ बियोग । 
पतिब्रता सिय परम सती नहि त्याजन जोग ॥ 
शील, अवस्था, व् रूप की राशि को रघुबर ने वियोग दिया यह पतिव्रता परमसती सीता कोई त्याज्य योग्य है ? 

बृहस्पतिवार, १८ अगस्त, २०१६                                                                                   
                                                                                
समर बीर पुनि जुगल जनावा । कहहु त असि सुभाग कहँ पावा ॥ 
चारित तेउ सदेउ पुनीता । परिहर देँ अस जोग न सीता ॥ 
तदनन्तर उन्होंने संग्रामवीर पुत्रों को जन्म दिया कहिए तो ऐसा सौभाग्य कहाँ प्राप्त होता है ? चरित्र से जो सदा से पवित्र हैं उसे त्याग दिया जाए वह सीता इस योग्य नहीं है | 

ताहि कर हम सबहि सुर साखी । राम बिनु सिय बिहग बिनु पाखी ॥ 
जासु चरन नित चिंतत जेहीं । मिले तुरतै सिद्ध फल तेही ॥ 
जिसके हम सभी देवता साक्षी हैं | राम के बिना सीता पंख के बिना पक्षी की भांति है | जो भक्त सीता के चरणों का चिंतन करते हैं उन्हें तत्काल ही सिद्धि का प्रसाद प्राप्त होता है | 

जगत सृजन थिति लय किन होही । होत सब श्री संकलप सोंही ॥ 
जिन सोंहि भगवद ब्यौहारा । सो त मरित अमरित की धारा ॥ 
संसार की सृष्टि, स्थति एवं लय आदि क्यों न हो उन शोभा श्री के संकल्प से वह सभी कार्य होते हैं | भगवद व्यापार भी उन्हीं से संपन्न होते हैं सीता ही मृत्यु है सीता ही अमृत की धार है | 

प्रभु जौ सूर सिया संतापा । प्रभु जौ जलधि सिया जल भापा ॥ 
प्रभु जौ गहबर घन सिय बारी । प्रभु प्रिय सियहि पदारथ चारी ॥ 
प्रभु यदि सूर्य हैं तो  सीता उस सूर्य का संताप है, प्रभु यदि जलधि हैं तो  सीता जल वाष्प है  | प्रभु यदि मेघ हैं तो सीता वर्षा है प्रभु की प्रिय सीता ही धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष है | 

ब्रम्हा शिव पद सिय सों पावा । तासु सबहि दिक् पाल जनावा ॥ 
जगदधात हे सर्ब ग्याता । जगद पिता तुम अरु सिय माता ॥
ब्रह्मा एवं शिव का पद सीता द्वारा ही प्राप्त होता है हम सभी लोकपालों को वही उत्पन्न करती हैं | हे जगत के निधाता ! आप जगत पिता हैं व् सीता जगज्जननी हैं |  

जानतहउ प्रभो आपहु, सिय नित सुधिता आहि । 
सो तो प्रिय प्रान सम तव अरु को प्रिय कर नाहि ॥ 

सीता नित्य पवित्र हैं आपको भी इस बात का संज्ञान है  प्रभु ! वह  प्राणों  के समान प्रिय है उनके अतिरिक्त  आपको और कुछ भी प्रिय नहीं है |  

शनिवार, २० अगस्त, २०१६                                                                                 

नित पावन पबित सित जानत ए । प्रभु दिजौ मान जसि पुरबल दए ॥ 
साप संगत तव पराभावा । अस तौ जग को करिअ  न पावा ॥ 
जनक  किशोरी सीता  को सदैव से पावन व् पवित्र है यह संज्ञान कर प्रभु ! आप पूर्व की भांति उनका आदर करें | किसी श्राप के संगत आपका प्रभाव हो  ऐसा करने के लिए संसार में कोई भी समर्थ नहीं है | 

सुनु मुनि प्रभु पहि गत पद गहिहउ । जे सबहि मम कही बत कहिहउ  ॥ 
बरुन नाथ कह बहुंत प्रकारा । एहि बिधि प्रगसिहि मनस विचारा ॥ 
हे मुनि श्रेष्ठ वाल्मीकि जी सुनिए ! प्रभु के पास जाकर उनके चरणों में नतमस्तक होते हुवे मेरी कही ये उक्तियाँ उनसे निवेदन करिएगा | प्रभु ! इस प्रकार सीता स्वीकार्य के सम्बन्ध में वरुण नाथ ने भिन्न-भिन्न कथन करते हुवे अपने मन के विचार प्रकट किए थे | 

सिया सकार जोग गोसाईं । लोकपाल सब सम्मत दाईं ॥ 
यह तुहरे जुग राज दुलारे । करिहि चरित जब गान तिहारे ॥ 
हे स्वामी ! सीता स्वीकार्य योग्य है इस हेतु सभी लोकपालों ने अपनी सहमति दी है | आपके इन राज दुलारों ने जब आपके चरित्र का गान किया | 

अह नर रूप धरे नारायन । बरुन पति घर गाएं रामायन ॥
सुरासुर गंधरब किन होई । भयउ कौतुक बिबस सब कोई ॥ 
अहो ! वरुण नाथ के धाम में नर के रूप धारण किए नारायण की रामायण कथा का गान किया वह फिर तब सुर असुर व् गन्धर्व ही क्यों न हो सभी कौतुहल के वशीभूत हो गए | 

सुनत सुमधुर राम कथा मन बहु रोचन होंहि । 
सब कीन्हि बढ़ाई तहँ मुदित भ्रात कर दोइ ॥ 
आपके पुत्रों के मुख से सुमधुर रामकथा का श्रवणपान कर सबका मन आनंदित हो गया | इन  दोनों भ्राताओं की सबने मुक्त कंठ से प्रशंसा की | 

रविवार, २१ अगस्त, २०१६                                                                                      
लोकाधिप असीस जो देईं । तुहरे सुत सो सहरष लेईं ॥ 
रिषि महरिषि गन ते अधिकाई । दोउ मान जस कीरति पाईं ॥ 
लोकाधिपों ने  जो आशीर्वाद प्रदान किया था आपके पुत्रों ने उसे सहर्ष स्वीकार्य किया | उन्होंने ऋषि महर्षिगणों से अधिक सम्मान व् कीर्ति प्राप्त की |   

पुण्य श्लोक पुरुष बर साथा । होवत तीनि लोक कर नाथा ॥ 
एहि औसर गहिहौ घट काँचा । गहस धर्मि निभ करिहहु नाचा ॥ 
पुण्यश्लोक (पवित्र यशवान ) पुरुषों के शिरोमणि के सह त्रिलोक नाथ होने के पश्चात भी इस समय आप मिट्टी की देह धारण करके गृहस्थ धर्मी की सी लीलाएं कर रहें हैं | 

बिधा सील गुन भूषन धारे । गहन जोग दुहु तनुज तिहारे ॥ 
सिय सुधित अब सबहि पतियारे । कुँअरु सहित प्रभु ताहि सकारें ॥ 
विद्या, शील व् गुणों के आभूषणों को ग्रहण किये ये दोनों पुत्र स्वाकार करने योग्य हैं | जनक नंदिनी जानकी की पवित्रता पर अब किसी संदेह नहीं है | दोनों कुमारों सहित को  सीता भी स्वीकार्य करें | 

प्रान दान दए सैन जियाई । अहहि बहुतहि सुचित सो माई ॥ 
दीन बन्धु हे दया निधाना । प्रतीति हुँत एहि  साखि प्रवाना ॥ 
 जो प्राणों का दान देकर सेना को जीवित कर दे वह माता अत्यधिक पवित्र होती हैं | हे दीनों के बधु ! हे दया के सागर ! यह प्रसंग माता सीता की पवित्रता पर विश्वास करने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण है | 

पतित अपबित पुरुष हुँत पावन हर ए प्रसंग । 
सुबरन बहुरि सुबरन हैं होइहि केत कुरंग ॥ 
यह प्रसंग पतित पुरुषों को भी पावन करने वाला है | प्रभु! कांतिहीन क्यों न हो स्वर्ण तो स्वर्ण होता है |  

Monday, 11 July 2016

----- ।। उत्तर-काण्ड ५३ ।। -----

पहुँच आसु करि कुस कै आगे । अनेकानेक सर छाँड़न लागे ॥ 
बधि बधि भाल बदन कर बाहू । भेद मर्म दिए दारुन दाहू ॥ 
राजा सुरथ शीघ्रता पूर्वक वहां पहुंचे |  रथ को कुश के सम्मुख करते हुवे वह अनेकानेक बाण छोड़ने लगे |  भाल, वदन, हस्त व् बाहु में घात पर घात करते हुवे मर्म को भेदकर कुश को कठिन पीड़ा से संतप्त कर दिया | 

करिअ बिकलतर अस रे भाई । घायल व्यथा कहि नहि जाई ॥ 
तब कुस रिजु कस सर दस मारे । सुरथन्हि रथ सोंहि महि डारे ॥ 
इस  प्रकार वीरों के शिरोमणि राजा सुरथ ने कुश को ऐसे व्याकुल कर दिया कि घायल अवस्था में मुझसे उनकी व्यथा कही नहीं जाती | तब कुश ने भी प्रत्यंचा कर्षित कर दस बाण छोड़े और  राजा सुरथ को रथ से भूमि पर धराशाई कर दिया | 

पनच चढ़ेउ कठिन कोदंडा । काटि बेगवत किए खनखण्डा ॥ 
दिव्यास्त्र छाँड़ै केहि एका । दूज प्रतिहरन हनहि अनेका ॥ 
प्रत्यंचा चढ़ाए हुवे उनके सुदृढ़ धनुष को वेगपूर्वक काटते हुवे खंड-खंड कर दिया | जब उनमें से कोई एक दिव्यास्त्र का प्रयोग करता तब दुसरा उसका प्रतिकार करते हुवे अनेकाने अस्त्रों का प्रयोग करता |  

छेपायुध जो कोउ प्रहारिहि । तुरगति प्रतिहति तुरति बिदारहि ॥ 
एहि भाँति भयउ दोनहु ओरा । लोमनु हरख समर घन घोरा ॥ 
जब एक पक्ष क्षेपायुध से प्रहार करता तब दूसरे पक्ष द्वारा आतुरता पूर्वक प्रतिघात करते हुवे उसका भी निवारण कर दिया जाता | इस  प्रकार उन दोनों वीरों के मध्य लोमहर्षक घनघोर संग्राम होने लगा | 

सोचि सिया कुँअरु अबु करि चाहिब कृत का मोहि । 
लेन जिआरी उद्यत अह सहुँ मम परम बिद्रोहि ॥ 
तदनन्तर सीता पुत्र कुश ने विचार किया अहो ! यह सुरथ मेरा परम विद्रोही हो गया है और मेरे प्राण लेने को उद्यत अब मुझे क्या करना चाहिए | 


बुधवार १३ जुलाई, २०१६                                                                                         


करतब ठान लच्छ अनुमाना ।  गहेउ हस्त कटुक एकु बाना ॥ 
छूट सो काल अगन समाना । प्रजरत चला कला कृत नाना ॥ 
तब कर्तव्य का निश्चय कर लक्ष्य का अनुमान किया तथा एक तीक्ष्ण एवं भयंकर सायक हस्तगत किया | छूटते ही वह  कालाग्नि के समान प्रज्वलित होकर नाना कलाएं करता आगे बढ़ा | 

देख्यौ सुरथ आगत ताहीं । सोचि बिदारन जूँ मन माही ॥ 
त्योहिं कठिन कुलिस के भाँती । धँसा बेगि परिछेदत छाँती ॥ 
उसे अपने सम्मुख आते देख सुरथ ने ज्योंही मन में उसके निवारण का विचार किया, त्योंही वह महासायक तीव्रता पूर्वक उनके वक्ष में धंस गया |  

परा रथोपर रन हिय हारे । तरपत हे रघुनाथ पुकारा ॥ 
सारथि निज पति हतचित पावा । रन भू  सोंहि बहिर लय आवा ॥ 
सुरथ मूर्छा को प्राप्त होकर रथ पर गिर पड़े व् पीड़ा से तड़पते हुवे रघुनाथ को पुकारने लगे | सारथी ने अपने स्वामी को जब रथ में अचेत पाया वह तब वह उन्हें रणभूमि से बाहिर ले गया | 

हार रन हिय सुरथ गिरि गयऊ । सिया कुँअर कर बिजई भयऊ ॥ 
देखियत इयहि पवन कुमारा । सहसा एकु बड़ साल उपारा ॥ 
इस प्रकार सुरथ परास्त होकर धराशाई होने पर  और सीता पुत्र कुश विजयी हुवे-- यह देखकर पवन कुमार हनुमान जी ने सहसा एक विसहाल शाल का वृक्ष उखाड़ लिया | 

धावत बेगि जाइ निकट, दए बल अतुल अपार । 
झटति डारेन्हि तापर, करियहि घोर प्रहार ॥ 
वेगपूर्वक दौड़ते वह कुश के निकट गए और अपरिमित बल के साथ उस वृक्ष को तत्क्षण प्रक्षेपित करके उनपर पर घोर प्रहार किया | 

द्रुम घात तैं चोट गहावा । संहारास्त्र लेइ उठावा ॥ 
अजित अमोघ सकती अस होई । लागत सीध बचै नहि कोई ॥ 
उस वृक्ष के आघात से चोटिल होकर कुश ने संहारास्त्र उठाया जिसकी शक्ति ऐसी दुर्जय  व् अचूक थी  व् शत्रु पर सीधा प्रहार करती थी इससे किसी का बच पाना कठिन था |  

बिलोकत ताहि प्रबल हनुमाना । बिघन हरन के करिहि ध्याना । 
देत घात घन ऐतक माही । हनुमन उरसिज आनि समाहीं ॥ 
उस अस्त्र का अवलोकन कर बलशील हनुमान विध्न हर्ता श्री राम चंद्र जी का ध्यान करने लगे | इतने में ही वह अस्त्र करारी चोट देते हुवे उनके वक्ष में समा गया | 

होइहि अह ब्यथक सो भारी । पीर भरत करि बहुंत दुखारी ॥ 
हतत आतुर मूरुछा दयऊ ॥ सुनु मुनिबर आगिल का भयऊ ॥ 
आह ! वह चोट की उस गहन वेदना  ने हनुमान जी को पीड़ा देते कष्ट से व्याकुल कर दिया | उस चोट से वह तत्काल ही मूर्छा को प्राप्त हो गए | हे मुनिवर ! 'तदनन्तर आगे जो हुवा उसे सुनो | ' 

हनुमत होइ गयउ हतचेता । सीता नंदन तब रनखेता ॥ 
कसि कसि रिजु असि बान चलायो ।एक एक तेउ सहस बनि धायो ॥ 
जब हनुमान भी मूर्छित हो गए तब सीता के पुत्रों ने राण क्षेत्र में प्रत्यंचा को कर्ष-कर्ष कर ऐसे बाण चलाए की वह एक एक बाण से सहस्त्र बाणों में परिणित होकर दौड़ने लगे | 

लपक लपक लागेउ तिमि जिमि गहि कालहि खाहि ।  
चतुरँगनि पराई चली, कहति त्राहि मम त्राहि ॥ 
ततपरता पूर्वक प्रतिपक्ष को ऐसे जा लगते जैसे उन्हें काल ही कवलित कर रहा हो | राम जी की चतुरंगिणी सेना इस आक्रमण से त्राहि त्राहिकर  भाग खड़ी हुई | 


बृहस्पतिवार १४ जुलाई  २०१६                                                                                             
भाँपत ए सब  मरनि निअराई  । अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥ 
कपि राजु सुग्रीउ तेहि काला । आनि सँभारेउ सैन बिसाला ॥ 
अब मृत्यु निकट है यह भांपते ही सब भय से अत्यधिक आक्रान्त हो उठे, फिर कोई  सम्मुख नहीं हुवा | उस समय कपराज सुग्रीव ने उस विशालवाहिनी के संरक्षक हुवे  | 

ऊंच ऊंच सो बिटप उठावा । नभ रव पूरत कुस पहिं धावा ॥ 
देइ बिदारिहि बिनहि प्रयासू । टूक टूक होइब सब आसू ॥ 
वह ऊँचे ऊँचे वृक्षों को उठाकर नभ को शब्दवान करते कुश की ओर दौड़ पड़े | कुश ने उन्हें प्रयास के बिना  उन सभी वृक्षों को शीग्रता पूर्वक विदीर्ण करके खंड-खंड |  

तबु कपिप्रभु एकु सेल उपारा । ताकि तमकत माथ दए मारा ॥ 
बिहुरत बनावरि  दरसत  ताहीं  । कन कन करि डारिहि छन माही ॥ 
तब कपिनाथ सुग्रीव ने एक भयंकर पर्वत  उखाड़कर कुश के मस्तक का लक्ष्य करते हुवे उसे तमक कर दे मारा | उस पर्वत को आते देख कुश ने शीघ्र ही सैकड़ों बाणों का प्रहार करके उसे चूर्ण चूर्ण कर भूमि पर गिरा दिया |  

करत धूर पुनि उड़इँ अगासा । भइ धूसर  रन भुइ चहुँ पासा ॥ 
लगन जोग मह रूद्र समाना । भए सो भूधर भस्म प्रमाना ॥ 
तत्पश्चात उसे धूल-धूल कर आकाश में उड़ा दिया | रण- भूमि भी चारों और से धूल-धूसरित हो गई| वह  पर्वत अब  महा रूद्र के शरीर में लगाने योग्य भस्म सा हो गया था  | 

मारि भालु कपि घायल कीन्हि । जो उचित जस तस फल दीन्हि ॥ 
बालक के बल बिक्रम अतीवा । देखिहि अचरजु भरे सुग्रीवा ॥ 
भालू एवं कपियों को चोटिल कर उन्हें घायल अवस्था में पहुंचा दिया जिसके लिए जो उचित था उसे वही फल दिया | बालक का ऐसा महान पराक्रम देखकर सुग्रीव को अत्यंत आश्चर्य हुवा | 

चित्रलिखित समेत कपिप्रभु चितवहि भर प्रतिसोध । 
प्रताड़न ताहि बिटप एकु गहि अतिसय कृत क्रोध ॥ 
ऐसी स्तब्ध दशा व् प्रतिशोध से भरी दृष्टि से सुग्रीव कुश को देखते रहे | फिर उन्होंने उसे  प्रताड़ित करने के लिए रोषपूर्वक एक वृक्ष हाथ में लिया | 
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ऐतक महुँ लव के बड़ भाई । बरनायुध चुनि चापु चढ़ाईं ॥ 
पुनि चित्रकृत निज बल दिखरायो । बरुण पास कपि सुदृढ़ बँधायो ॥ 
इतने में ही लव के बड़े भ्राता कुश ने वरुणायुध का चयन कर धनुष पर संधान किया | तत्पश्चात चित्रवत करने वाले बल का प्रदर्शन करते हुवे कपि नाथ सुग्रीव को वरुण पाश में बाँध लिया | 

लपटाहि जिमि कोउ उरगारी । बँधत गिरे रन भूमि मझारी ॥ 
निरखिहि जुधिक परे निज नाथा । धाएउ इत उत भय के साथा ॥ 
वह पाश उनपर ऐसे वलयित हुवा जैसे वह कोई सर्प  हो |  उससे बंधते ही सुग्रीव रण भूमि पर गिर पड़े |  अपने संरक्षक को धराशायी देखकर रण योद्धा भयाक्रात होकर इधर-उधर दौड़ने लगे | 

बीरसिरोमनि भ्राता दोई । बहोरि बिजै कलस कर जोई ॥ 
पुष्कल अंगद कि प्रतापाग्रय । बीरमनि हो चहे अन्यानय ॥ 
वीरों के शिरोमणि उन दोनों भ्राताओं ने विजय कलश करोधार्य करते हुवे, पुष्कल, अंगद हो कि प्रतापाग्रय अथवा अन्यान्य वीरमणि ही क्यों हो |  

करत हताहत सकल  भुआला । दोउ भ्रात गहेउ जयमाला ॥ 
दोनउ भात परस्पर हेलिहि । हरषित  मनस मुदित मन मेलिहि ॥ 
सभी राजाओं को हताहत कर दोनों भ्राताओं को विजयमाल ग्रहण की |  दोनों भ्राता एक दूसरे का अभिनन्दन करते हुवे हर्षित एवं प्रमुदित मन से आलिंगन किया  |  


गहे गुरु चरण बसिहि सघन बन भेसु धरेउ  जिमि कोउ जति । 
मख तुरग निबंधु दोनहु बंधु मह मह बीर ते बीर अति ॥ 
बाल मराल कोउ भुआल न सहुँ चतुरंगी बाहिनी । 
चले गगन सर भाल कराल तथापि जीति बिनहि अनी । 
गुरु के चरणों के शरण हुवे   दुर्गम वन में निवासरत यति का वेश धारण किए वीरता में एक से बढ़कर एक उन युगल भ्राताओं ने भगवान के यज्ञ सम्बन्धी अश्व को परिबद्ध कर लिया | वे बाल हंस न कोई राजा थे न ही उनके पास कोई चतुरंगिणी वाहिनी ही थी | सेनारहित होने के पश्चात भी  गगन में विकराल भालों एवं  तीरों को चलाकर उन्होंने अद्भुद  वीरता व् अदम्य साहस का परिचय देते हुवे विजयश्री प्राप्त की  | सार यह है कि  बल पर बुद्धि की विजय होती है | 

हरखिहि सुर न त बरखिहि सुमन न कोउ अस्तुति गाए। 
न कतहुँ दुंदुभि बजावहिं बिजित सुभट समुदाए ॥  
न देवता ही हर्षित हुवे न पुष्पों की वर्षा हुई न कोई स्तुति गाई गई | वीरों के विजित समूह द्वारा न कहीं दुंदुभि ही निह्नादित हुई |  


शुक्रवार १५ जुलाई, २०१६                                                                                     

मुदित मनस बहु हरखित गाता । बोलेउ लव सुनहु मम ताता ॥ 
होइहि तुहरी कृपा अपारा । समर सिंधु पायउँ मैं पारा ॥ 
ऐक सैनि सेना के उन दोनों वीर बालकों में से लव ने हर्षित देह व अत्यंत प्रसन्न मन से कहा : -- ' सुनों मेरे भ्राता ! तुम्हारी अपार कृपा के कारण ही मैं इस संग्राम सिंधु  को पार करने में सफल हुवा | 

अजहुँ भई रन बिजै हमारी । हेरै कोउ सुरति चिन्हारी ॥ 
कहत अस लव सहित निज भाई । प्रथमहि रिपुहन पहिं नियराईं ॥ 
इस रण में हमारी विजय हुई है जिसके प्रमाण हेतु हमें कोई स्मृति चिन्ह  ढूंढ़ना चाहिए, ऐसा कहते ही लव अपने भ्राता के साथ सर्वप्रथम शत्रुध्न के पास गए | 

गयउ तहाँ दुहु गहगह गहि कर । हिरनमई मनि मुकुट मनोहर ॥ 
आयउ जहँ पुष्कल महि पारे । कबेलाकृत किरीट उतारे ॥ 
वहां जाकर दोनों ने उत्साहपूर्वक शत्रुध्न के मस्तक का  हरिण्य मय मनोहर मुकुट हाथों में लिए वहां आए  जहाँ पुष्कल भूमिगत थे | प्रथमतः उनका कमलाकृत मुकुट उतारा | 

बहुरी बाहु सिखर लगि पूरा । गहि तासु कल कनक केयूरा ॥
कवच कराल भाल सर चंडा । सकेरिहि कछु कठिन कोदंडा ॥ 
तत्पश्चात भुजाओं से कंधे तक आभूषित उनके सुन्दर स्वर्णमय केयूर लिया  कवच, भयंकर भालों और प्रचंड सायकों सहित कुछ सुदृढ़ धनुषों को संकलित किया |  

बांध्यो जाइ पहिं बानर राजु अरु महबली हनुमन्तहि । 
कहत लव निज भ्रात सों तात लै जइहौं कुटीरु दुनहु गहि ॥ 
तहँ मुनि बालक केलिहि ता सँग मोरु मन रोचन होइहीं ।  
राख्यो निकट तुरग थल लाई दुहु बंधु करत अस बत कही ॥ 
तत्पश्चात वह बालक वानर राज सुग्रीव व् महाबली हनुमंत के पास गए और उन्हें बांध लिया | लव ने अपने भ्राता से कहा हम इन दोनों वानरों को  पकड़ कर अपनी कुटिया लिए जाते हैं वहां मुनि  के बालक  इनके संग जब बालक्रीड़ा करेंगे तब मेरा भी मनोरंजन हो जाएगा  ऐसी बातें करते उन दोनों भ्राताओं ने यज्ञ सम्बन्धी उस अश्व को ले जाकर आश्रम के एक निकट एक स्थान पर बाँध दिया |  

जोहति सुतहि पंथ जगज जननि मातु श्री सोभामई । 
थिर थिर थकी ढरयो रबि दिनु बिरत्यो अरु साँझ भई ॥
अँधेरिया जग घेरिया जग जगमग जोत जुहार करे  । 
बरति बिलग जोहहि द्वार लग दीपन मनि सार भरे ॥ 

सुभ बसन भूषन बँधि कपिगन तुरग सहित सादर चले । 
जाइ सिया पहिं अरपिहि चरन नत भेँट भूषन जे भले ॥ 
आगत देखि दुहु बाल मराल मुदित बहु लोचन भरी । 
लाइ हरिदै सनेह सहित दुइ पलकन जल बिन्दु धरी ॥ 

चकित सकुचित अंचित बदन करि ढारि दृग पट हरयरी । 
परचत कपिगन भेंट भूषन सहसा सिहरति अति डरी ॥ 
उठि त्याजत निबंधु छोरि कहि सुत जाहु दुहु कै पग परौ  । 
कपिराजु बली महबीर जे अबिलम अतुरै परिहरौ ॥ 

जे महमन हनुमन भयउ रघुबर केर सहाइ । 
भस्म भई लंका पुरी दनुपत गयउ नसाइ ॥ 

रविवार, १७ जुलाई, २०१६                                                                                        

जे बलबन कपि भल्लुक नाहा ।  कहु दोनहु अस बाँधिहु काहा। 
मारि कुटत पुनि करिहु अनादर । रे बच्छर धिक् धिक् तुहरे पर ॥ 
ये वीर बलवान भालू व् वानरों के स्वामी हैं कहो तो  तुमने इन दोनों को क्यों बांधा ? फिर मार कूटकर इनका अनादर भी किया अरे बालकों ! धिक्कार है तुमपर | 

बोलेउ सुत सुनहु हे माता । राम नामु नृपु एकु बिख्याता ॥ 
बीर सिरो मनि बहु बलवंता । दसरथ तनय अवध के कंता ॥ 
माता के ऐसा कहने पर बालकों ने उत्तर दिया : -- हे जननी सुनो ! ' विश्व प्रसिद्द एक राजा हैं जिनका नाम राम है, वह महाबलवन्त वीरों के शिरोमणि हैं तथा दशरथ के पुत्र व् अवध के स्वामी हैं | 

तेज तुंग एकु तुरग त्याजे। सुबरन पतिआ भाल बिराजे ॥ 
नाउ परच बल बिक्रम बिसेखे । परन परन बिबरन यहु लेखे ॥  
उन्होंने तेज से युक्त एक ऊँचे अश्व का त्याग किया है उसके ललाट पर एक स्वर्ण-पत्रिका विराजित है जिसके पत्रों में उनका नाम व् विशेष पराक्रम का परिचय देते हुवे यह विवरण उत्कीर्ण हैं कि : -- 

बलबन आपनु समुझिहि जोई । हरिहु ताहि बढ़ सद् छत्रि सोई ॥ 
न त मम सम्मुख अवनत माथा । समरपिहु राज पाट जुग हाथा ॥ 
' जो स्वयं को बलवान मानता हो वह सद क्षत्रिय इस अश्व का हरण करे अन्यथा मेरे सम्मुख नतमस्तक होकर हाथ बांधे अपने राजपाट का समर्पण करे |' 

दरस ढिठाई महिपु की साँच कहएँ हे मात । 
अहा हठात जाई पहिं बाँध लिये बरियात ॥ 
हे माता ! हम सत्य कहते हैं, उस महिप की यह धृष्टता देखकर हमने अश्व के पास जाकर उसका हठात हरण किया तत्पश्चात उसे बलपूर्वक बाँध लिया | 

सोमवार, १८ जुलाई, २०१६                                                                                           
पुनि सो समर बीर बल पूरा । गरज गहन रन भेरि अपूरा ॥ 
बरूथ बरूथ भट हमहि पचारे । किए घन घोर समर गए मारे ॥ 
तदनन्तर बल से परिपूर्ण संग्राम वीरों से युक्त उस राजा ने गरजते हुवे  रण भेरी निह्नादित कर गहन रण आरम्भ कर दिया, तब उस घमासान करते हुवे यूह के यूह योद्धा हमारे द्वारा परास्त होकर वीर गति को प्राप्त हुवे  | 

मौलि मुकुट एहि रिपुदवनू के । ए कल कंकन भरत नंदनू के ॥ 
बोलिहि मातु पुनि मुख नेहि के । गहिहु तुरग कहहु सो केहि के ॥ 
यह मुकुट रिपुहन के मस्तक का है और यह सुन्दर कंकण भरत नंदन पुष्कल का है | तब माता ने उनके मुख को स्नेह करते हुवे पूछा : -  'अच्छा यह बताओ जो अश्व तुमने पकड़ रखा है वह किसका है ?' 

प्रथमहि हम जो तोहि जनाईं । सोए रघुबर तासु गोसाईँ ॥ 
रे बछर तुम करिहउ न न्याए । हरिहु तुरग रघुबीर परिहाए ॥ 
बालकों ने उत्तर दिया : - 'प्रारम्भ में हमने आपको जिनका परिचय दिया था वह राजा रामचंद्र जी इस अश्व के स्वामी हैं |' माता सीता ने कहा : - अरे मेरे बालकों !  रघुवीर के त्यागे हुवे  तुरंग का हरण कर तुमने न्याय नहीं किया | 

अनेकानेक बीरन्हि हनिहउ । पुनि बाँध कपिगन सुठि न करिहउ ॥ 
होए ए करतब कछु भल नाही । सुनु एहि बत नहि तुमहि जनाही ॥ 
अनेकानेक वीरों को हताहत करते हुवे इन कपियों को बांधकर तुमने उचित नहीं किया |  जो हुवा सो अच्छा नहीं हुवा,  तुम जिन बातों से अनभिज्ञ हो उसे ध्यान पूर्वक सुनो | 

जनमदात सो पितु तुम्हारे ।  महा मेध हुँत हय परिहारे ॥ 
सुनु छाँड़त सादर कपि दोऊ । बँधे बाजि परिहरहउ सोऊ ॥ 
जिन्होंने इस यज्ञ सम्बन्धी अश्व का त्याग किया है वह तुम्हारे पिता है उन्होंने तुम्हें जन्म दिया है | अब मेरी बाते सुनो : - 'तुम इन दोनों वानरों को आदर सहित मुक्त करो | बंधे हुवे अश्व का भी विमोचन कर दो |' 

सुनत मातु कर बत कही बाल बीर बलवंत । 
साधे मौन मूरत भए सो एकु पल परजंत ॥ 
माता के वचनों को श्रवण कर वह बलवंत बाल वीर मौन साध कर एक क्षण के लिए मूर्तिवत हो गए | 

मंगलवार, १९ जुलाई, २०१६                                                                                   

पुनि बालक बोलिहि रे माता । अहहीं बेद बिदित एहि बाता ॥ 
सो छत्रि धरम हमहु अनुहारे । महमन महिप समर गए हारे ॥ 
तत्पश्चात बालक बोले : - 'हे माते ! जो वेद विदित निगदन है' हमने उसी क्षत्रिय धर्म का अनुशरण किया है जिससे वह महातिमह राजा संग्राम में परास्त हुवे | 

छत्री धर्म अनुहर रन आगी । लागत जनि होत न हतभागी ॥ 
बालमीक मुनिबर पाहिं पढ़े । ए सिच्छा देइ सो हमहि गढ़े ॥ 
क्षत्रिय धर्म के अनुसार रण रूपी अग्नि के लगन से अन्याय का भागी नहीं होना पड़ता | मुनिवर वाल्मीकि जी से विद्या ग्रहण की है उन्होंने यह शिक्षा देते हुवे हमें गढ़ा है | 

छात्र धर्म कह कहिब ग्याता । पिता ते पुत भ्रात ते भ्राता ॥ 
सिस समुह चहे गुरु किन होईं । जूझत रन भू पाप न होई ॥ 
क्षात्र धर्म का व्याख्यान करते हुवे विद्वानों ने कहा है -- 'पुत्र पिता के , भ्राता भ्राता के एवं शिष्य गुरु के सम्मुख ही क्यों न हो उनका युद्ध-भूमि में युद्ध  करना दोष नहीं होता | 

तद्यपि जसु तुहरे अनुसासन । बंधे बाजि बर करिअ बिमोचन ॥ 
ता संगत बहरिहिं कपि दोऊ । होइहि सोए कहब तुम जोऊ ॥ 
तद्यपि आपकी आज्ञा का पालन करते हुवे हम इस बंधे हुवे अश्व को विमोचित किए देते हैं तथा इन वानरों को भी मुक्त कर देते हैं | आपकी जैसा कहेंगी वैसा ही होगा | 

अपूरत निज मंजुल मुख मध्यम मधुरित बानि । 
सिरु नत बहु बिन्यानबत दोउ जोग जुग पानि ॥ 
अपने मंजुल मुख को इस प्रकार की मध्यम व् मधुरिम वाणी से परिपूरित कर वह दोनों माता सीता के सम्मुख हाथ जोड़े अति विनम्रता से नतमस्तक हुवे | 

बृहस्पतिवार, २१ जुलाई, २०१६                                                                                     

जग बंदित मातु अस कहयऊ । गए दुहु तहाँ जहाँ रन भयऊ ॥ 
लए कपीस गन आगिल बाढ़े । तुरंगम सहित दिए दुहु छाँड़े ॥ 
फिर जगद वंदिनी मातु के कथनानुसार वहां गए जहाँ यह महा संग्राम हुवा था वह उन दोनों कपीश्वरों को लेकर आगे बढे एवं उन्हें तुरंग सहित मुक्त कर दिया | 

दुहु सुत करम कटकु बिनसाई । सुनिहि सुतहि मुख जबु जग माई ॥ 
प्रणति चरनन सुरति भगवाना । मन ही मन पुनि करति ध्याना ॥ 
अपने दोनों बालकों के मुख से उनके द्वारा सेना का मारा जाना सुनकर जगज्जननी भगवान श्रीराम चंद्र जी का स्मरण  मन-ही मन उनके चरणों में  प्रणाम अर्पित किया | भगवान का ध्यान करते हुवे : - 

सदागतिबत सबहि के  साखी । भगवन केतु कंत पुर लाखी ॥ 
कहि करुणित हे दिनकर देऊ । जौं मैँ मन क्रम बचनन तेऊ ॥ 
सदैव गतिवान सर्वसाक्षी सूर्यदेव का लक्ष्य कर करुणामयी वाणी से बोलीं : - हे दिनकर ! हे देव  !  यदि में मन, क्रम, वचन से : -  

बंदउँ चरन श्री रघुबरहि के । भजेउँ भजन न आन केहि के ॥ 
तौ मरनासन नृपु रिपुहन्ता । अजहुँ छन महुँ होएँ जीयन्ता ॥ 
अन्य किसी को न भज कर यदि मैं रघुवर जी की चरण-वन्दना करती हूँ तो मरणासन्न राजा शत्रुध्न इसी क्षण जीवंत हो जाएं | 

बिरुझत बिदरत बहु बरियाईं । मोर तनय ते गयउ नसाई ॥ 
रकताकत अनी सोउ भारी । मोर सत सोहिं होए जियारी ॥ 
मेरे पुत्रों का सामना करने के कारण उनके बल की तीक्ष्णता से यह क्षत-विक्षत होकर रक्तारक्त हुई यह विशाल सेना मेरे सत के प्रभाव से पुनर्जिवि हो |  

पतिब्रता सति जानकी जस अस बचन  उचारि ।  
तैसेउ मरति जिअत उठि बिनसि सैन सो भारि ॥ 
पतिव्रता सती सीता जी ने जैसे ही ऐसे वचनों को उच्चारित किया वैसे ही मृत्यु के सन्निकट वह विशाल सेना जीवित हो गई | 

शुक्रवार, २२ जुलाई, २०१६                                                                                      
कहत सेष सुनु मुनि बिद्वाना । छन महुँ मुरुछा गयउ बिहाना ॥ 
जगएं जगज जिमि सयन त्यागे । मरनासन रिपुहन जिअ जागे ॥ 
शेष जी ने कहा हे विद्वान मुने सुनिए ! रयनावसान के पश्चात शयन का त्याग कर जिसप्रकार संसार जागृत होता है  उसी प्रकार मरणासन्न शत्रुध्न जी की मूर्छा का भी क्षण मात्र में ही अवसान हो गया और वह भी जागृत होकर जीवंत हो उठे | 

लहि सुभु लच्छन गहि गुन गाढ़े  । देखि तुरग मम सम्मुख ठाढ़े ॥ 
मनि मुकुताबलि मुकुट न माथा । धनु बिनु कर भुज सिखर न भाथा ॥ 
उन्होंने देखा शुभ लक्षणों व् उत्तम गुणों से युक्त यज्ञ सम्बन्धी अश्व निर्बाध रूप में मेरे सम्मुख खड़ा है, मणि मुक्तावली से जटित मुकुट मस्तक पर नहीं है, हस्त धनुष से रहित हैं कंधे तूणीर से विहीन हैं | 

निरजिउ परेउ अनि जिअ गयऊ । संकित मन बहु अचरज भयऊ ॥ 
चितबत चित्रकृत नयन अलोले । जागत सुबुध सुमति सहुँ बोले ॥ 
मृतप्राय सेना जीवित हो उठी है यह  दृष्टिपात कर उनके सशंकित मन आश्चर्य से चकित रह गया | तब वह स्तब्ध होते हुवे स्थिर नेत्रों से मूर्छा से जगे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ सुमति से बोले : -- 

जौ नहि जति नहि कोउ भुआला । कृपा करत सो बाल मराला ॥ 
बाँधेउ बाजि बल दिखरायो । मख अपूरनन दए बहुरायो ॥ 
जो न कोई सन्यासी है न नरेश ही हैं उन बाल हंसों ने इस अश्व को बांध कर अपने अभूतपूर्व बल का प्रदर्शन किया तथा हम पर कृपा करते हुवे यज्ञ पूर्ण करने के लिए उसे लौटा भी दिया | 

गहरु करब कछु लाह न आही । चलहु बेगि अबु रघुबर पाहीं ॥ 
अब विलम्ब करने से कोई लाभ नहीं है हमें तत्परता से रघुवीर के पास चलना चाहिए 
गहरु -विलम्ब 
अह लोचन पथ लाइ के जोह रहे रघुराय । 
असि कहत चढ़ि राजहि रथ समर भूमि सिरु नाइ ॥ 
अहो !  पथ पर नयन लगाए रघुराज हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे | ऐसा कहकर शत्रुधन समर-भूमि को नमस्कार करके रथ में विराजित हो गए | 

शनिवार, २३ जुलाई, २०१६                                                                                       

राजत रथ रथि लेइ तुरंगा । चलइँ चरन पथ पवन प्रसंगा ॥ 
चतुरंग अनि आयसु सिरु धारे । चलिहि पाछु सबु साजु सँभारे ॥ 
रथी के विराजित होते ही उक्त श्रेष्ठ तुरंग को साथ लिए वह रथ पवन के प्रसंग पथ पर संचालित होने लगा | सेनापति की आज्ञा सिरोधार्य करते चतुरंगिणी सेना भी समस्त रनोपकरण को संजोए उसके पीछे चलने लगी | 

बाजिहि भेरि न संख अपूरे । गयउ बेगि आश्रमु ते दूरे ॥ 
अगमु पंथ गहन बन गिरि ताला । तीर तीर तरि तरुबर माला ॥ 
न रणभेरी निह्नादित हुई न शंख ने ही विजय नाद किया ( रण में परास्त होने के पश्चात भी विजयी की भाँति ) वह आश्रम से दूर होते गए | अगम्य पंथ जो  पर्वतों सरिताओं व् सरोवरों से युक्त सघन विपिन से परिपूर्ण था,  तटों पर श्रेष्ठ वृक्षों की श्रेणियां उसे घेरे हुवे थीं | 

देइ दरस जबु भयउ बिहंगा । तरंग माल सुसोहित गंगा ॥ 
पार गमन आयउ निज देसा । मरुत गति सों कीन्हि प्रबेसा ॥ 
जब वह लगभग उड्डयन करते चले तब उन्हें तरंग मालाओं से सुशोभित देवनदी श्रीगंगा के दर्शन होने लगे | गंगा पारगमन होते हुवे उन्होंने मारुत-गति से अवध प्रदेश में प्रवेश किया | 

पौर पौर पुर  नगर निकाई । पुरजन परिजन  बसित सुहाईं ॥ 
कंध कठिन कोदण्ड सम्भारे । सैन सहित रिपुहन मन मारे ॥ 
चरण-चरण पर निवास से नगर व् पुर के निवासों  में अधिवासित पुरजन एवं परिजन सुहावने प्रतीत होते थे | कन्धों पर सुदृढ़ धनुष को संधारण किए वैमनस्य होकर : - 

बीर भरत कुँअर कर सथ लेइँ सुरथ सँग माहि । 
रथारोहित जाहिं चले रघुकुल कैरव पाहि ॥ 
रथ में आरोहित शत्रुध्न सेना सहित भरत पुत्र वीरवान पुष्कल व् सुबुद्ध सुरथ को साथ लिए रघुकुल कैरव श्री राम चंद्रजी के पास चले जा रहे थे | 

सोमवार, २५ जुलाई २०१६                                                                                          

बहुरि बिहुरत चरत सब डगरी । आएँ समीप अजोधा नगरी ॥ 
अमरावति जसि अति मन मोही । रबि बंसज बन संग सुसोही ॥ 
तदनन्तर सभी पंथों को छोड़ते हुवे वह अयोध्या नगरी के निकट पहुंचे | यह अयोध्या स्वर्ग के जैसी अत्यंत मोहिनी थी जो सूर्यवंशी वृक्षों के वन से सुशोभित थी | 

सोंहि रुचिर पर कोट अतीवाँ । जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ॥ 
परस नभस धुर धुजा उतोले । हरुबर हरुबर पवन हिलोले ॥ 
मनोहर राजप्रासाद  अत्यंत सुशोभित हो रहा था  मानो वह तीनों लोकों के सौंदर्य की सीमा हो,  शीर्ष पर उत्तोलित ध्वजा जैसे नभ को स्पर्श करती प्रतीत होती थी, पवन के मंद मंद  झौंके उसे  तरंगित कर रहे थे | 

आए  रिपुहन सुनिहि श्री रामा । सैन सहित हय पहुंचय धामा ॥ 
कह जय जय अतिसय हरषायो । बलबन लछमन पाहि पठायो ॥ 
भगवान श्रीराम ने जब सुना कि भ्राता शत्रुध्न का आगमन हो गया है सेना सहित अश्व भी आ पहुंचा है तब वह जयनाद करते अत्यंत हर्षित हुवे एवं वीर बलवान लक्ष्मण को अभिनन्दन हेतु शत्रुध्न के पास भेजा | 

सैन सहित तहँ आयउ लषमन । भेंटि परबसिया भात मुदित मन ॥ 
रकतारकत चाम चहुँ पासा । पलउ पलउ जिमि पलय पलासा ॥ 
लक्ष्मण भी प्रमुदित मन से सेना का साथ कर प्रवास से आए हुवे लघु भ्राता से भेंट किए |  आघात से शत्रुध्न की चाम ऐसे रक्तारक्त थी मानो पत्र पत्र पर पलास पल्ल्वित हो रहा हो |  

कुसल छेम बुझाई कहि भाँति भाँति बहु बात । 
बलिहि बाहु फेरब भई अतिसय पुलकित गात ॥ 
उन्होंने उनका कुशल क्षेम पूछा तथा भांति भांति की वार्ता की | बाहु वलयित कर उनका आलिंगन करते समय देह पुलकित हो रही थी | 

बुधवार २७ जुलाई, २०१६                                                                                       

लै रिपुहन सथ रथ महुँ बैठे । लछिमन नगर मझारिहि पैठे ॥ 
जहँ त्रिभुवन कर पावन पबिता । प्रभु पद परसति सरजू सरिता ॥ 
शत्रुध्न के साथ रथ में विराजित होकर महामना लक्ष्मण ने विशाल सेना सहित अयोध्या नगरी के मध्य में प्रवेश किया |  शत्रुध्न के साथ  रथ में विराजित होकर महामना लक्ष्मण ने विशाल सहित अयोध्या नगरी के मध्य में प्रवेश किया | जहाँ प्रभु के चरणों को स्पर्श करती हुई त्रिभुवन को पावन करने वाली पवित्र सरिता बह रही थी | 

पद पद पदमन पुन्य पयूषा । सरनिहि सरनिहि सस मंजूषा ॥ 
लगए मग लग सुरग सोपाना । सोहति सारद ससी समाना ॥ 
 कमलों से युक्त वह पुण्य सलिल चरण चरण पर प्रसारित हो रहा था धान्य मंजिरियों की श्रेणियों से युक्त मार्ग उससे संलग्न होकर स्वर्ग की सीढ़ियों का आभास देते हुवे वह शरत्कालीन शशि के समान सुशोभित हो रही थी | 

भरत नंदनहि रिपुहन साथा । आगत दरस हरषि रघुनाथा ॥ 
सहित सुभट अति निकट बिलोके । उर अनंदु घन गयउ न रोके ॥ 
श्रीरघुनाथ जी शत्रुध्न को भरत नंदन पुष्कल के साथ आते देखकर प्रफुल्लित हुवे |  वीर सैनिकों सहित जब उन्हें अपने सन्निकट देखा तब वह ह्रदय के आनदोल्लास को रोक न सके | 

बिहबल मन मिलनब जूँ ठाड़े । तुरतई रिपुहनहि कर बाढ़े ॥ 
सघन घाउ नहि खात अघाई । पगु परि बिनय सील सो भाई ॥ 
विह्वल मन से मिलने के लिए वह ज्यूँ ही खड़े हुवे त्योंही शत्रुध्न के हस्त तत्परता से आगे बढ़े | आघात से अतृप्त गहरे घाव लिए उस विनयशील भ्राता ने भगवान के चरणों में प्रणाम निवेदन किया | 

जनु महि लुठत स्नेह समेटे । उठइ भुजा कसि बरबसि भेँटें ॥ 
गहरईं घन गिरहि जल बूंदी । पेम निमगन पलकन्हि मूँदी ॥ 
भगवान ने मानो भूमि पर लोटते प्रेम को समेटकर उन्हें बलपूर्वक उठाया और ह्रदय से लगा लिया | आनंद का वह घन गहन हो गया उससे जलबिंदु झरने लगी प्रेम में निमग्न होकर उन्होंने पलकें मूँद लीं | 

परइँ चरन भरतु नंदन सादर करइँ प्रनाम । 
उठइँ लै उर कसइँ बाहु द्रबित दरस पुनि राम ॥ 
भरत नंदन पुष्कल ने भी उनके चरणों में सादर प्रणाम निवेदन किया | भगवान श्रीराम ने द्रवीभूत देखकर उन्हें भी उठाया और अपनी भुजाओं में कर्ष लिया | 

शुक्रवार, २९ जुलाई, २०१६                                                                                         


                                                                                        
मिलि हनुमत पुनि लमनत बाहू । सुग्रीव सहित मेलिं सब काहू । 
पग परे नृपन्हि हरिदै लाए । भेंटें उमगि सनेहि बहुताए ॥ 
हनुमंत से भेंट करने के पश्चात बाहु प्रलंबित कर भगवान सुग्रीव सहित अन्य सभी वीरों से मिले | अन्य बहुतक स्नेहियों से उत्साहपूर्वक मधुर मिलन किया,  चरणों में पड़े राजाओं को उन्होंने ह्रदय से लगा लिया |  

समदत सन्नत सैन समाजू । छुधावंत जिमि पाए सुनाजू ॥ 
गहि पद लगे सुमति प्रभु अंका । जनु भेंटी सम्पद अति रंका ॥ 
सादर प्रणाम करते हुवे सैन्य समाज ने उनसे ऐसे मिला जैसी क्षुधावन्त को उत्तम अनाज प्राप्त हुवा हो | सुमति भी भक्तों पर अनुग्रह करने वाले भगवान श्रीरामचन्द्र जी से ऐसा गहन आलिंगन किया जैसे  दरिद्र को अतिसय धन-धाम मिलता है | 

प्रफुरित नयन ठाढत समुहाए । आयउ निकट उलसित रघुराए ॥ 
देखि सुमति गदगद गोसाईं । मधुर बचन ते पूछ बुझाईं ॥
श्रीरामचन्द्र जी प्रफुल्लित लोचन व् उल्लसित मन से सम्मुख खड़े हुवे  अपने मंत्री सुमति के समीप आए व् उन्हें देखकर गदगद होते हुवे मधुर स्वर में प्रश्न किया  : -- 

जगकर यहु सब राजाधिराजे । पाहुन बनि इहँ आनि बिराजे ॥  
सब समेत धारिअ मम पाऊँ । बाँध क्रम कहु कवन सो राऊ ॥ 
मन्त्रिवर !  जगत भर के राजाधिराजा का अतिथि रूप में यहां आगमन हुवा हैं | इन सभी ने सम्मिलित होकर मेरे चरणों में प्रणाम निवेदन किया है, क्रमबद्ध रूप इनका परिचय देते हुवे कहो ये कौन हैं | 

कहौ तुरंगम कहँ कहँ गयऊ । बाँधियब केहि केहि गहयऊ ॥ 
कुसल बंधु मम कवन उपाऊ । केहि बिधि कहु ल्याए छँड़ाऊ ॥ 
यह अश्व कहाँ-कहाँ गया  किस-किस ने इसका हरण किया किस- किस ने इसे परिरुद्ध किया | मेरे इस कुशल बंधू ने किस युक्ति से तथा कौन सी विधि से उसका विमोचन किया ?'

कहत सुमति तुम सरबग्य कहु कह कहा जनाउँ । 
पूछिहउ मोहि जोए प्रभु सो बरनत सकुचाउँ ॥ 
सुमति ने कहा : -- 'भगवन ! आप तो सर्वज्ञ हैं, आपके समक्ष में क्या संज्ञान करूँ | सब कुछ ज्ञात होने पर भी आपने मुझसे जो प्रश्न किए हैं उनका उत्तर देते हुवे मुझे संकोच हो रहा है |